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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 40.pdf/२९६

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२३५. पत्र : माधवजी वी० ठक्करको

१५ अप्रैल, १९२९

भाईश्री माधवजी,

तुम्हारा तार मुझे मिल गया था किन्तु उसमें जवाब देने लायक कुछ नहीं था । अब तो धीरजसे काम लेनेकी बात है । कमजोरी है, इसकी चिन्ता न करना । एक-एक घंटे पर दूध लेनेके बदले अन्तर बढ़ने दो। दो घंटेके बाद लेना ठीक होगा । मात्रा चाहे उतनी ही रहे । पेट उसे पचा सके, इसके लिए भी तो समयकी जरूरत रहती है ।

मोहनदासके वन्देमातरम्

गुजराती (जी० एन० ६७७६) की फोटो - नकलसे ।
 

२३६. पत्र : छगनलाल जोशीको

[ १६ अप्रैल, १९२९][]

चि० छगनलाल,
मसूलीपट्टम छोड़ने से पहले यह लिख रहा हूँ ताकि आजकी डाक खाली न जाये ।

जो मन्दिरके नियमोंका पालन करे, मन्दिर उसीका है । जो नियम भंग करेगा,पकड़ा जानेपर उसे मन्दिर छोड़ना ही होगा। यदि कोई दोष करे और वह दोष पकड़ में आ जाये तो हम इसपर खेद न करें। हम दोष करनेवालेसे बड़े नहीं हैं । परिस्थिति में पड़कर शायद हम भी वैसा ही आचरण करते। यह समझकर उनपर प्रेम बनाये रखें। प्रायश्चित्त रूप में उपवास करनेकी बात भूल जायें। इसपर मनसे विचार करके कुछ भी नहीं हुआ, यह मानते हुए जो काम सामने हो, सो करते रहें। इसके बाद दुख माननेका कोई कारण नहीं बच रहना चाहिए । फिर दोष होंगे, हम यह मानकर उनके लिए तैयार रहें। इसमें मैंने कोई नई बात नहीं कही है । किन्तु तुम, मन्दिरको आध्यात्मिक उन्नति कैसे हो, इस समय इसकी चिन्ता न करो। इसी हेतुसे यह लिखा है । तुम स्वस्थ रहोगे तो उसीमें सब कुछ पा लिया है, ऐसा मानो ।

  1. १. गांधीजी १५ अप्रैलको मसूलीपट्टममें थे। लगता है कि उन्होंने पह पत्र दूसरे दिन वैजवाड़ाके लिए रवाना होनेसे पहले लिखा था ।