करोड़ों रुपये विदेशोंको चले जाते हैं। खादीपर खर्च किया गया एक रुपया देशको जिलाता है, विदेशी कपड़ोंपर खर्च करनेसे वही देशका नाश करता है ।
विदेशी-वस्त्र-बहिष्कार समितिके कार्यालयसे जो पत्रिकाएँ प्रकाशित होती हैं उनसे बहिष्कार आन्दोलनकी प्रगति के समाचार मिलते हैं। पहली पत्रिकामें बहिष्कारके पक्षका समर्थन किया गया है । इसकी ३०,००० प्रतियाँ छापी गई हैं और नाम मात्रके लिए एक पैसा मूल्य रखा गया है। मैं पत्रिकाके कुछ रोचक अंश नीचे दे रहा :[१]
- [ अंग्रेजीसे ]
- यंग इंडिया, १८-४-१९२९
२४७. आन्ध्र देशमें [ - १]
आन्ध्र देशकी पहले कई बार स्थगित यह यात्रा इस समय मैं ऐसे मौसम में कर रहा हूँ, जो मेरे साथ-साथ कार्यकर्त्ताओंके लिए भी कष्टप्रद है । यह सबसे कड़ी गर्मीका मौसम है और मुसाफिरीकी लम्बी-लम्बी मंजिलोंके कारण मैं प्रायः थक कर चूर हो चुका हूँ । सन्तोष यही है कि यात्राके उबानेवाले कार्यक्रमके होते हुए, और प्रायः प्रतिदिन मोटरकी मुसाफिरीके अनिवार्य रहते हुए भी मैं सुबह १० से तीसरे पहर ५ बजेतक अकेला रह सकता हूँ, बीचमें सिर्फ कातते समय १ घंटेके लिए मिलने-जुलनेवालोंसे बातचीत हो जाती है। इससे मुझे विश्राम लेने, पत्र - सम्पादन करने और पत्र-व्यवहारके लिए समय मिल जाता है ।
हमारी इस यात्राका आरम्भ हैदराबादसे ही हो गया था । हैदराबादके डा० लतीफी हमें वाड़ी जंकशनपर मिले और उन्होंने हममें से हरएकका ध्यान बड़ी खूबीसे रखा ।
हैदराबादमें जनताकी एक विशाल भीड़ने हमारा स्वागत किया। सिर्फ गाड़ीसे उतर कर मोटरमें बैठते-बैठते ४५ मिनट बीत गये। दोनों ओरके नातेके कारण हमारे ठहरनेका प्रबन्ध सरोजिनी देवीके 'गोल्डन थ्रेशोल्ड' नामक बंगले में किया गया । यहाँ डाक्टर नायडू और पद्मजाने हमें घरकी यादतक न आने दी। श्रीयुत वामनराव नायक हमारी इस सारी खातिरदारीके संयोजक थे । अपने योग्य स्वयंसेवकों की मदद और स्वेच्छापूर्वक दी गई हैदराबाद पुलिसकी सहायताके रहते हुए भी श्री नायक सार्वजनिक सभा में जनताका जो समुद्र चारों ओरसे उमड़ा हुआ चला आ रहा था उसे काबू में न ला सके। मैं यहाँ उन सब सभाओं और संस्थाओंका उल्लेख नहीं करूँगा, जहाँ श्री वामनराव नायक हमें ले गये थे ।
देशभक्त कोंडा वेंकटप्पैयाने हैदराबादके चन्देकी जो सूची तैयार की है उसे नीचे दे रहा हूँ ।[२] श्री वेंकटप्पैया अपनी अर्द्धांग पीड़ित पत्नीको घरपर बीमार छोड़-कर हमसे हैदराबादमें आ मिले थे ।