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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 40.pdf/३०८

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२५१. पत्र : छगनलाल जोशीको

[ १९ अप्रैल, १९२९][]

चि० छगनलाल,

तुम्हें कल पत्र नहीं लिख पाया । सारा समय 'यंग इंडिया' में लगाना पड़ा ।

मुझे छोटी से छोटी खबर भी लिखने में संकोच न करना । मुझे मालूम होना ही चाहिए। मगनलाल मुझे रोज पत्र नहीं लिखता था । कई बार तो पत्र मिलता ही न था । उसे मेरे विचारोंका पता था । और मैं यह भी देखता हूँ कि मुझपर झूठी दया करते हुए या किसी अन्य कारणसे उसने मुझे कई बातें नहीं बताई थीं । किन्तु हमें किसीके दोषोंका अनुकरण नहीं करना । मगनलालकी अविचल श्रद्धा, उसका आश्रम में निमग्न हो जाना, उसकी जबरदस्त जागरूकता आदि अनुकरणीय गुण थे । यह तो अब हम समझ गये हैं। मुझसे एक बात छिपाना भी पाप समझना । अब मुझे क्या आघात पहुँच सकता है ?

मा ... के[] बारेमें तुम्हें थोड़ा-बहुत लिख चुका हूँ । मुझे तुरन्त लिखना था पर ऐसा कर नहीं पाया । मा... मुझे मिल गया है। उसने अपनी पवित्रताकी सौगन्ध खाई, इसलिए मैं चुप रह गया और मैंने कहा, “अब तुम अपनी इच्छासे अपनी जिम्मेदारी पर काम करो। मैंने तो तुम्हें अपना शक बता दिया है, इसलिए मेरा काम तो हो गया है ।"

इसलिए अब मा... आये सो करे । भूल करे के बारेमें शक न करना । वह सयाना है । जो उसके मनमें अथवा पाप उन दोनोंसे दूसरे लोग मुक्त रहेंगे। फिर भी मा ... साथी है इसलिए उस हदतक तो दोष हमारे सिर भी पड़ेगा। हमें उस लड़कीको मन्दिरमें रखने की जरूरत नहीं है । जिस प्रकार मन्दिर एक भयंकर प्रयोग है, उसी तरह मा को भी समझो ।

यदि तुम्हें यशोदा बहनके झूठ बोलनेके बारेमें शंका न हो तो उसे अवश्य चले जाना चाहिए। सूरजभान आग्रह करे और तुम उसे रहने दो तो मैं तुम्हें दोषी

नहीं मानूंगा । यह तुम्हें परसों लिख ही चुका हूँ । अब यह विचार और पक्का हो गया है। सूरजभान और यशोदा बहन चाहे एक-साथ रह लें, जैसा कि नानुभाई और डाहीबहनके बारेमें किया है। काम दोनों करें। मेरी सलाह है कि इसी प्रकार सीतलासहाय और सरोजिनी बहन भी रहें। नये दम्पतिको न लेनेका निर्णय कर सकते हो । किन्तु यदि उन्हें आश्रम में आने दें तो वे ब्रह्मचर्य पालनकी शर्तपर एक-साथ

  1. १. सूरजभानके आश्रम में रहने के उल्लेखसे, जिसके बारेमें गांधीजीका कहना है कि उन्होंने “परसों" लिखा था; देखिए “पत्र: छगनलाल जोशीको", १७-४-१९२९ ।
  2. २. नाम नहीं दिया गया है।