ताजे दूधके सारे गुण पाये जाते हैं, सिवा उन विटामिनोंके जो मेरे विचारमें कच्ची पत्तेवाली सब्जियोंसे प्राप्त होते हैं ।
- सस्नेह,
बापू
- अंग्रेजी (जी० एन० ९४२२) से; तथा सी० डब्ल्यू० ५३६६ से भी ।
- सौजन्य : मीराबहन
२५४. बहिष्कार ही लोक-शिक्षा है
विदेशी वस्त्रके बहिष्कारको कामयाब बनानेकी दिशा में काम करते हुए कितनी लोक-शिक्षा दी जा सकती है, मामूली आदमी इस बातका खयाल भी नहीं कर सकता। भाई जेठालाल गोविन्दजीको बिजोलिया में इस कामका अनुभव हुआ है और इसी कारण वह समय-समयपर अपने विचार मुझे लिखते रहते हैं । यहाँ उनकी कुछ बातोंका मैं अपनी भाषामें सार-मात्र देता हूँ । इससे ऊपरके पहले वाक्यका अर्थ थोड़ा स्पष्ट होगा ।
- अगर बाईस करोड़ किसान खादी पहनने लगें तो विदेशी वस्त्रका बहिष्कार फौरन कामयाब हो जाये । उन्हें खादी पहनाने का मतलब है, उन्हें खादी - शास्त्रकी बारीकियाँ समझाना, स्वावलम्बन पद्धतिके फायदे बताना, खादी की तमाम क्रियाएँ सिखाना आदि । इस कामके लिए स्वयंसेवकों की जरूरत है, चलती-फिरती शालाओंकी जरूरत है, और जरूरत है कातने पींजनेकी क्रिया सिखानेवाली पत्रिकाओंके प्रकाशन और उनके प्रचार की ।
यह तो उनके पत्रका थोड़ेमें आशय-मात्र हुआ । इसके भीतर छुपी हुई बातोंका विस्तारसे विचार करके पाठक बहिष्कार द्वारा होनेवाली लोक-शिक्षाका अन्दाजा खुद कर सकते हैं ।
यह शिक्षा कौन दे ? शिक्षा-शास्त्री इसे कौन-सा स्थान दें ? जिन अंग्रेज शिक्षा-विशारदोंको वर्तमान ब्रिटिश साम्राज्यको मजबूतीका खयाल रखना पड़ता है वे तो इसे स्थान देंगे नहीं; हाँ, भारतीय शिक्षा-शास्त्री, जो देशमें किसानोंका राज्य कायम करना चाहते हैं वे इस शिक्षाको अपना केन्द्र बनायें, तो अच्छा हो। अगर उक्त आशय ठीक हो तो ऊपर जिस शिक्षाका जिक्र किया गया है, वह राष्ट्रीय विद्यालयों द्वारा दी जानी चाहिए, यानी राष्ट्रीय विद्यालयों में इस तरहकी शिक्षा देनेवाले प्रचारक तैयार होने चाहिए । एक राष्ट्रवादीके लिए यह शिक्षा उसके राष्ट्रसेवा - साहित्यकी बारहखड़ी होनी चाहिए।
जितने शास्त्र हैं, सब रसपूर्ण हैं । जो यह कहते हैं कि फलाँ शास्त्रमें ही रस है, दूसरोंमें नहीं, वे शास्त्रका सच्चा मर्म ही नहीं समझते । कोई काम करने या