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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 40.pdf/३१६

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

उनके मार्गकी एक कठिनाईको हमें मंजूर करना चाहिए। आज वे जिस तरीकेसे व्यापार करते हैं, खादी के व्यापारमें उससे काम नहीं चल सकता । चालू व्यापार-पद्धति में खरीदारकी भलाईका कोई खयाल नहीं होता, यही वजह है कि अधिकांश व्यापारी अपनेको नीतिके बन्धनोंसे परे समझते हैं। अगर खादीमें भी इसी तरीकेसे काम लिया जाये तो खादी बरबाद हो जाये, मिट जाये । मतलब यह है कि खादीका व्यापार सिर्फ साधुमना व्यापारी ही कर सकता है। खादीके व्यापारमें मामूली व्यापारी की चोंच गीलो नहीं हो सकती । सामान्य व्यापारमें फँसा हुआ व्यापारी शीघ्र ही धन कमानेकी आशा रखता है, मगर खादीके व्यापारीको तो आजीविका मात्र कमाकर सन्तोष करना पड़ता है। मामूली कपड़ेके व्यापारीका मार्ग बन चुका है, उसके पास कपड़े की चुनिन्दा किस्में होती हैं, लेकिन खादीके व्यापारीको नित नई तरकीबोंसे काम लेना पड़ता है। इसी कारण यह आशा नहीं की जा सकती कि अभी तत्काल ही खादीके व्यापारको बहुत-से व्यापारी अपना लेंगे। जो मुट्ठीभर व्यापारी खादीके व्यापार में हाथ डाल कर बैठे हैं वे अच्छी तरह जानते हैं कि इस व्यापारमें कामयाब होनेके लिए उन्हें किस तरह एड़ी-चोटीका पसीना एक करना पड़ता है ।

अतएव जिस वर्गने इस वक्त खादीको अपने हाथोंमें ले रखा है, अच्छा हो अगर अपूर्ण होते हुए भी, अभी वही इसका प्रचार करे। आश्चर्य तो यह है कि अपूर्ण होते हुए भी यही वर्ग आज खादीको जिन्दा रखे हुए है ।

श्री मथुरादास पुरुषोत्तमका सुझाव तो आज भी मुझे त्याज्य नहीं लगता । उसमें बहुत लोगोंकी तैयारी आवश्यक नहीं है । मेरे पास जो पत्र आये हैं उनसे ही मुझे पता चलता है कि सिलाई जाननेवालोंमें से बहुतसे खादीको सिलाई कर सकते हैं । इस काम में संगठनकर्त्ताके अभाव में संगठनकी कठिनाई जरूर है । अगर एक आदमी इसी कामको करनेपर कमर कस ले तो यह काम हो सकता है । मेरा विश्वास है कि श्री मथुरादासका यह सुझाव एक न एक दिन जरूर ही सफल होगा ।

खादीकी कई एक किस्मोंको रूढ़ (पेटेंट) बनानेकी कोशिशकी जा रही है, लेकिन इन पत्र-लेखकको और दूसरोंको जान लेना चाहिए कि इसकी अपनी सीमा है । खादी कारखानों में नहीं बल्कि लाखों घरोंमें पैदा होती है और उनका सूत एक. सरीखा नहीं होता। इस प्रकार खादीकी किस्ममें फर्क तो हमशा रहेगा ही । इस तरह का फर्क रहना कोई बुराई भी नहीं है । जिसमें मौलिकता नहीं है, व्यक्तित्व नहीं है, वह कला भी नहीं है । सूतकी हरएक लच्छीपर उसके बनानेवाले हाथोंकी कुछ-न-कुछ छाप तो रहेगी। मशीनसे निकले सूतके धागेमें यह खूबी कहाँ ?

अतएव इस पत्रका उपयोग उसके दो सुझावों में है : एक तो स्वदेशी अर्थात् खादीको भावनाका प्रचार, और दूसरे, व्यापारियों द्वारा खादीको अपनाना । फिर भी पत्रकी दूसरी बातोंसे पत्र लेखकके खादी विषयक प्रेमका पता चलता है । ये विचार दूसरोंके दिलमें भी आये होंगे, यही सोचकर इसपर चर्चा की गई है।

[ गुजरातीसे ]
नवजीवन, २१-४-१९२९