२. पत्र : स्वामी गोविन्दानन्दको
मारवाड़ जंक्शन
१६ फरवरी, १९२९
मुझे दुख है कि तुम्हारे साथ अकेलेमें बात करनेका जितना समय मिला था उससे ज्यादा नहीं मिल सका। अब मैं तुमसे अपने हृदयकी बात पत्रके अपूर्ण माध्यमसे कहूँगा।
मैं अब तुमसे आशा करता हूँ कि तुम अपने उत्तरदायित्वोंको पूरा करोगे और सबके साथ मधुर व्यवहार करोगे, जैसा कि तुमने वादा किया है। तुम्हें दूसरोंके हृदय जीतनेके लिए विनम्र बनना होगा। तुम्हें एक सच्चा संन्यासी बनना चाहिए जिसके अन्दर क्रोध न हो, विद्वेष न हो और न अपने लिए कोई इच्छा हो। मैंने इस तथ्यको नजरअन्दाज नहीं किया कि अपने निकटके इनेगिने अनुयायियोंके सिवा तुम्हारे पीछे और कोई शक्ति नहीं है। सार्वजनिक कार्यके लिए धनकी आवश्यकता होनेपर तुम उसे इकट्ठा नहीं कर सकते। ये सारी चीजें बदलनी चाहिए। तुमने त्याग किया है, तुम्हारे अन्दर साहस है; फिर वह क्या चीज है जो लोगोंकी भलाईको खातिर ही उनके ऊपर और अधिक प्रभाव स्थापित कर पानेसे तुम्हें रोकती है?
जब पद ही तुम्हें नहीं चाहता तो तुम पदकी कामना क्यों करते हो? तुम जिस बहुत ही मामूली बहुमतकी सहायतासे पदपर आसीन रह सकते हो, वह कोई सच्चा सन्तोष नहीं दे सकता, और न तुम्हें सेवाका कोई वास्तविक अवसर ही प्रदान कर सकता है। अगर तुम पदको सेवा करनेका माध्यम मानते हो, तो तुम उस पदको तबतक ग्रहण करनेसे क्यों नहीं इनकार कर देते जबतक कि तुम्हारे विरोधी लोग भी तुमसे पद-ग्रहण करनेका आग्रह न करें?
मैं तुम्हारी इच्छाओंको जिस हदतक समझ सका, उस हदतक मैंने उन्हें यथासम्भव पूरा किया है। लेकिन मैं चाहूँगा कि चुनाव पूरे होनेके बाद या उससे पहले ही तुम, यदि तुममें विनयशीलता हो तो, जयरामदास तथा अन्य लोगोंसे परामर्श करके किसी दूसरे अध्यक्षका विचार करो जिसे तुम सब सर्वसम्मतिसे निर्वाचित कर सको। किसी भी सुरतमें, मैं तुमसे आशा करता हूँ कि तुम सिन्धमें कांग्रेस- संगठनका कार्य सुचारु रूपसे और ईमानदारीसे चलाओगे। अक्लमन्दको इशारा काफी है। मैं आशा करता हूँ कि तुम इस पत्रको गलत नहीं समझोगे और न इसके गलत अर्थ लगाओगे?[१]
हृदयसे तुम्हारा,
- ↑ देखिए "सिन्धके संस्मरण", २१-२-१९२९ भी।