पत्र मिलनेके बाद विचार करता रहा हूँ । उसका यह परिणाम है । यह पत्र है सिर्फ तुम्हारे ही लिए किन्तु किसीको पढ़ाना चाहो तो पढ़ा सकते हो। मैं चाहता हूँ कि महादेव आदिको पढ़ने देना। लेकिन तुम किसीको भी पढ़नेको न दो तो मुझे दुख नहीं होगा ।
बापूके आशीर्वाद
- गुजराती (जी० एन० ५४०७) की फोटो-नकलसे ।
२७६. पत्र : गंगाबहन वैद्यको
२७ अप्रैल, १९२९
ऐसा लगता है कि तुमने आजकल पत्र लिखना बन्द कर दिया है । पागलपनसे भरे छोटे-बड़े किन्तु तुम्हारे उद्गारोंको व्यक्त करनेवाले पत्र तो मुझे मिलने ही चाहिए।
बापूके आशीर्वाद
- [ गुजरातीसे ]
बापुना पत्रो - ६ : गं० स्व० गंगाबहेनन
२७७. मूक सेवा
- ठक्कर बापाका नीचे लिखा एक पत्र आन्ध्र देशकी मुसाफिरीमें मिला है :[१]
मुझे इन ढेढोंके पुरोहित और भीलोंके गुरुसे[२] ईर्ष्या होती है । हम दोनों समान उम्रके हैं। मगर मेरे शरीरको हिफाजतकी जितनी जरूरत है, ठक्कर बापाके शरीरको उतनी जरूरत नहीं है । मैं आन्ध्र देशकी यात्राका कष्ट सहन कर सकता हूँ, इस विचारसे मन-ही-मन कुछ-कुछ फूल रहा था, दौड़ धूपको सोच-सोचकर अपने ऊपर तरस खा रहा था, देशभक्त वेंकटप्पैया वगैरा साथियोंको बहुत ज्यादा दौड़धूप कराने पर डाँटता-फटकारता भी था कि इतने में मेरे मदको चूर-चूर करनेके लिए यह पत्र आ हो पहुँचा । कहाँ तो ऊँट और सिन्धका रेगिस्तान, और कहाँ ऊबड़-खाबड़ होने पर भी जिसपर मोटर चल सके ऐसा यह रास्ता -- और मोटर भी ऐसी जिसमें मेरे सोनेकी सुविधा रहती है ।
लेकिन मैं अपनी ईर्ष्या प्रकट करनेकी गरजसे यह पत्र नहीं दे रहा हूँ । ठक्कर बापाके ऊँटका होदा देखकर मैं गरीब अपनी छोटी-सी मोटरको छोड़ नहीं दूंगा । सिन्यके रेगिस्तान मुझसे आन्ध्रके आसान रास्तोंको नहीं छुड़ा सकते ।