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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 40.pdf/३७६

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३०९. पत्र : रमणीकलाल मोदीको

[३ मई, १९२९ से पूर्व][]

चि॰ रमणीकलाल,

इस समय सबेरेके ५-३० बजे हैं। पहले तुम्हारा पत्र लिया है। तुम्हें भेजनेके लिए तार[] लिखकर भेज भी दिया है। तुम उद्योग मन्दिर या आश्रमसे बेशक मुक्त हो जाओ। इस समय इसीमें तुम्हारी भलाई है, ऐसा मैं मानता हूँ। तुम्हारा हृदय अत्यन्त सरल है; किन्तु तुम्हारी बुद्धि कच्ची है। तुम धर्माधर्मका निर्णय स्वयं नहीं कर पाते और किसी बातके बारेमें तुम तर्कपूर्ण विचार भी नहीं कर पाते। इसलिए कई बार भटक जाते हो और बादमें घबराते हो। ऐसी स्थितिमें मैं मानता हूँ कि तुम्हारा अलग रहकर कुछ अनुभव प्राप्त करना ही अच्छा है। तुम्हारा हृदय साफ है, इसलिए जहाँ रहोगे शोभा पाओगे।

मेरी सलाह तो यह है कि जिस प्रकार पन्नालाल आश्रमके पास अलग घर लेकर रहेगा और जिस प्रकार बुधाभाई रहते ही हैं उसी तरह तुम भी आश्रममें एक मकान किरायेपर लेकर अपना स्वतन्त्र जीवन व्यतीत करो। तुम्हें आश्रमके बाह्य नियमोंके पालनके बन्धनसे मुक्त होना है। अपनी इच्छासे प्रार्थनामें आओ, यह अलग बात है। तुम्हारी वेतन लेनेकी इच्छा हो या उसकी आवश्यकता हो तो बेतन भी लो। इस समय तुम तुरन्त जबलपुरके आसपास जो अकाल फैला है, उसके कारण वहाँ खादी-कार्यका क्षेत्र कैसा है, इसकी खोजबीन करने निकल पड़ो। इसमें एकाध महीना लग जायेगा। उस प्रदेशकी आबोहवा अच्छी मानी जाती है। यह काम पूरा होनेपर क्या करना है, यह देख लेंगे। तुम्हारे लिए काम तो बहुतसे तैयार रखे हैं। मुझे लगता है कि ताराका आश्रमसे सम्बन्धित रहना जरूरी है। स्त्रियोंके लिए जो-कुछ वहाँ है वह और कहीं नहीं है। तारा स्वतन्त्रतापूर्वक रहे और आश्रमसे वह जो ले सके ले, जो दे सके वह दे। इस संसारमें बिना दिये कोई ले नहीं सकता। कोई स्वेच्छासे देते हैं, कोई जबरदस्ती, कोई समझबूझ कर देते हैं, कोई अनजाने।

इस सबको तो मेरी सलाह-भर ही मानना। यदि मनकी शान्तिके लिए तुम्हारा इस समय इस वातावरणसे बाहर रहना जरूरी हो, तो जरूर वैसा करो।

अब तुम्हारे पत्रमें जो स्पष्ट विचारदोष हैं, उनके बारेमें लिखता हूँ।

ये तुम्हारे वाक्य हैं: "मसालेवाला भोजन खाऊँ तो अस्वाद व्रतके भंगका दोष मेरे सिर आता है, ऐसा मुझे नहीं लगता। 'गीता' जबानी याद न हो तो आश्रमका नियम तोड़ता हूँ और इससे मेरी उन्नति बाधामें पड़ती है, ऐसा मुझे नहीं लगता।" स्वतन्त्र रूपसे देखें तो ये वाक्य ठीक हैं; किन्तु वस्तुस्थितिके वर्णनके रूपमें ये

  1. साधन-सूत्रके अनुसार पत्र ३ मई, १९२९ को आश्रममें प्राप्त हुआ था।
  2. उपलब्ध नहीं है।