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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 40.pdf/३७७

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पत्र : रमणीकलाल मोदीको

गलत हैं। हमारी निय मावलीमें मसालोंको अस्वाद व्रतका विरोधी माना गया है, इसलिए उन्हें खाना दोष है। सम्भव है, वास्तवमें इसमें कोई दोष न हो। यदि दोष नहीं है, तो यह नियम रद्द कर देना चाहिए। किन्तु जबतक यह नियम बरकरार है तबतक उसका पालन करना हमारा कर्त्तव्य है। पाँच वस्तुएँ मात्र खानेके साथ अस्वाद व्रतका भले ही कुछ सम्बन्ध न हो; किन्तु मैंने यह व्रत लिया है। इसके पालनमें कोई अनीति नहीं है, इसलिए इसका पालन मेरा कर्त्तव्य ही बन जाता है। गीता-पाठके सम्बन्धमें भी यही बात लागू है। वह हमारे नियमोंमें नहीं है; पर उसकी योग्यताको हमने स्वीकार किया है। हम उसे बालकोंको कण्ठस्थ कराते हैं और उसे अपना आध्यात्मिक कोष कहते हैं। इसलिए मैंने ऐसा माना है कि मेरी इस मान्यतासे तुम सब भी सहमत हो। यदि इसके बाद हम उसके लिए प्रयत्न न करें तो हमारे सत्यके व्रतपर कलंक लगता है। तुम सब अवकाशके अभावमें 'गीता' कण्ठस्थ न कर सको यह बात समझमें आती है; किन्तु हमेशा गीता-पाठकी स्तुति करते रहकर भी तुम उसके लिए समय न निकालो तो क्या तुम सत्यका भंग नहीं करते?

किन्तु इस समय तो इससे अधिक नहीं लिखूँगा। सामान्य रीतिसे विचार करनेवाला आदमी थककर उधेड़बुनमें पड़ जाता है। इसी कारण सत्यकी आराधना करनेवाला बहुत विचार करनेके फेरमें नहीं पड़ता और कुछ बातोंको प्राणपणसे अपनाये रहता है और अन्तमें वह उन्हींमें से पूर्ण सत्यकी खोज कर लेता है। अमुक बात ठीक है या गलत, नित्य ऐसी शंका करनेके बदले वह जो-कुछ स्वीकार कर लेता है, नम्रतापूर्वक उसीमें निमग्न रहता है। "सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः।" हमारा हर विचार, हर काम ही जब अपूर्ण है तो वहाँ भूलें होनेका अवकाश तो है ही, ऐसी अवस्थामें क्या करें? जबतक वे सम्पूर्ण न हो जायें तबतक यदि हम उन्हें करें ही नहीं अथवा उनके विषयमें शंकित बने रहें तो कोई भी काम कभी सम्पन्न नहीं हो सकता?

तुम दोनोंका भला हो।

बापूके आशीर्वाद

गुजराती (जी॰ एन॰ ४१४४) की फोटो-नकलसे।