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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 40.pdf/३८०

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३१३. पत्र : द॰ बा॰ कालेलकरको

४ मई, १९२९

दोबारा नहीं पढ़ा
चि॰ काका,

तुम्हारा पत्र मिल गया है। 'जोडणी कोश' की[] संशोधित दूसरी आवृत्तिका प्रबन्ध किया जा रहा होगा। इस विषयमें मेरा ऐसा ख्याल है कि बालूभाईसे कहा जाये कि वे नगरपालिकाओंकी पाठशालाओंमें शब्दोंकी इस वर्तनीका प्रचार करायें; अर्थात् शिक्षकोंका तदनुसार शब्दोंके हिज्जे करना आवश्यक कर दिया जाये। इसी प्रकार गुजरातमें जो-जो संस्थाएँ चल रही हैं उनमें भी इनके प्रवर्तनका विचार कर लेना।

इस प्रचारके साथ-साथ हमें अपने कोशकी प्रतियाँ भी अधिक मुद्रित करनी चाहिए। इसका आकार भी कम किया जाना चाहिए और इसके लिए खास कागज काममें लाया जाना चाहिए। बने तो इसे प्लेटें या स्टीरियोटाइप कराकर छाप लेना चाहिए।

मथुरादासके बारेमें तो अब इतना ही बाकी रह जाता है न कि तुम उसे बुलवा लो? मैं तुम्हारे ही मोढ़िएसे काम ले रहा हूँ। लक्ष्मीदासके मोढ़िएसे अधिक इसमें कोई खासियत मुझे नहीं दिख सकी। केशूके मोढ़िएसे तो यह बढ़कर जरूर है। क्या तुमने इसपर लक्ष्मीदासकी राय मालूम की है? तुम्हारे मोढ़िएपर अपेक्षाकृत कितना कम खर्च बैठता है? इस विषयमें तुम्हें मीराबहनसे चर्चा कर लेनी होगी। वह हर चीजको गाँववालोंकी दृष्टिसे देखती है, यह अच्छी बात है। गराड़ीको वह इसी दृष्टिसे छोड़कर नरम तकुएका उपयोग करती है। यदि यह तकुआ ठीक काम देता हो तो हम तकुआ सीधा करना सिखाना बन्द ही कर सकते हैं और उसकी कीमत एक पैसा ही रख सकते हैं। यह कोई मामूली बात नहीं होगी। सम्भव है ऐसे तकुएके लिए तुम्हारा मोढ़िया असफल सिद्ध हो क्योंकि इस हिस्सेके लिए थोड़ी जगहकी जरूरत पड़ती है। तुम्हारे और केशू दोनोंके मोढ़ियोंमें तकुआ कैद हो जाता है और उस हालत में अगर तकुआ बिलकुल सीधा न लग पाये तो मुझे लगता है वह चल नहीं सकेगा। इस पर सोचना और जब मैं वहाँ आऊँ तब चर्चा करना; अगर लिखना चाहो तो लिखकर भेजना।

आशा है कि मैं २८ मईसे १० जूनतक तो वहाँ रहूँगा ही। इस अवधिमें से एक पूरा दिन तुमको दूँगा।

  1. देखिए "जोडणी-कोश", ७-४-१९२९।