प्रभुदास तुम्हारे पास आये या अलमोड़ा रहे इनमेंसे क्या अधिक ठीक होगा सो तो अलमोड़ाके बारेमें अधिक समझनेपर ही तय हो सकेगा। अगर मैं अलमोड़ा गया तो मैं पता लगा लूँगा; नहीं तो अन्तिम निर्णय उसीपर छोड़ देंगे।
जमनादासकी उलझन सुलझाना कठिन है। गांधी-परिवारके प्रति तुम्हारे मनमें कोई झिझक नहीं है, यह एक प्रकारकी जीत ही है। जबतक झिझक हो व्यक्तिमें तटस्थता नहीं आती। अब अगर कोई गांधी कुछ कहे तो उसे कहने दो। तुम्हें जो योग्य जान पड़े वही कहो और तदनुसार करो तो बस है। मुझे लगता है कि जमनादास इत्यादिको इन दिनों बहुत जल्दी चीटे लग जाते होंगे। यों भी जमनादास खीझ उठता है, इसलिए उसे जहाँतक बने निभाना तो पड़ेगा ही। शालाके इस विषयमें आखिर हमें क्या करना होगा सो तो अभी सोच नहीं पा रहा हूँ।
बाल इन दिनों चुप हो गया है। उसको मनोदशा कैसी है?
मैं तुम्हें उद्योग मन्दिरके विषयमें नहीं लिखता। उसका उद्देश्य तुम्हारी शक्ति और अपना समय बचाना है। किन्तु अगर तुम्हें कुछ लिखने लायक लगे तो अवश्य लिखना। जहाँ सहज ही बीचमें पड़ना जरूरी हो जाये वहाँ अवश्य ऐसा करना।
बापूके आशीर्वाद
सौजन्य : काकासाहब कालेलकर
३१४. पत्र : बालकृष्ण भावेको
४ मई, १९२९
जितनी हिम्मत है, चाहो तो उतना काम करो; किन्तु फिर हार मत मानना और अपना स्वास्थ्य मत बिगाड़ लेना। और बातें तो मिलनेपर ही करेंगे।
बापूके आशीर्वाद
सौजन्य : बालकृष्ण भावे