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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 40.pdf/३८५

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हमारा कलंक

यह संग्रह हमारे यानी हिन्दुओंके कलंकका इतिहास है। 'हमारे' सर्वनामका उपयोग मैं जान-बूझकर कर रहा हूँ। 'नवजीवन' के ग्राहकोंमें तो मुसलमान, पारसी और ईसाई भी हैं। मगर मैं एक हिन्दूके नाते यह लेख तो सिर्फ गुजरातके हिन्दुओंके लिए लिख रहा हूँ।

जिस धर्मके अनुयायियोंके कारण अन्त्यजोंको पानीतक मिलना दुश्वार हो जाये, उसकी निर्दयताको क्या कहा जाये। पानीका त्रास तो एक दुश्मनको भी नहीं दिया जाता। जब हम अन्त्यजको अपने कुओंसे पानी भी नहीं भरने देते, ऐसी दशामें वे हमारे यहाँ आकर पानी पीनेकी हिम्मत कैसे कर सकते हैं? अन्त्यजके लिए रेलगाड़ीमें 'हटो-बचो' दूकानपर आये तो 'दूर-दूर' मन्दिरमें पैर रखे तो हमजैसे उच्च वर्णवालोंके भगवानके अपवित्र होनेका डर, और वह हमारे बच्चोंके साथ पढ़ने बैठे तो हमारे बच्चों तकको इसमें आपत्ति होती है और यह सब चलता है धर्मके नाम पर।

मैंने 'सनातन' धर्ममें इसका कोई आधार नहीं देखा। जो देखना चाहते हैं, वे देख सकते हैं कि आज सनातन धर्मके नामपर पाखण्ड फैल रहा है। हम अपनी पीठ स्वयं नहीं देख सकते; किन्तु अगर दूसरे उसे देखकर उसकी गन्दगीकी बात हमें बतायें, तो हम उसे भी नहीं सुनना चाहते।

मुझ जैसे लोग, जो इसी वातावरणमें रह कर बड़े हुए हैं, और फिर भी अपने आसपास की गन्दगी देख सके हैं, 'सनातनियों' द्वारा 'भ्रष्ट' कहे जाते और सताये जाते हैं। लेकिन यह सच है कि अब अधिक समयतक हम इस कलंकको छातीसे लगाकर न रख सकेंगे। मेरे समान एक नहीं बल्कि अनेक हिन्दुओंने इस पापको अपनी आँखों देखा है और इसे दूर करनेकी कोशिश कर रहे हैं। यह संग्रह उनकी इस कोशिशमें मददगार बन सकता है। यह हमें हमारे पापोंकी याद दिलाता है और उनकी भीषणता बतलाता है।

मैं चाहता हूँ कि इस संग्रहसे लाभ उठाया जाये। अन्त्यज सेवाके काममें हमें द्रव्यकी उतनी कमी नहीं है। श्री रामेश्वरदास बिड़ला द्वारा दी गई दानकी सारी रकम अभी खर्च नहीं हो पाई है। वस्तुस्थिति तो यह है कि जिस तरह खादीमें श्रद्धा होनेपर अनेक नवयुवक खादी-कार्य द्वारा अपना जीवन सुखी बना सकते हैं, उसी तरह अन्त्यज सेवामें श्रद्धा रखनेवाले लोग भी सुखी हो सकते हैं। हजारों अच्छे और साफ दिल हिन्दू, जिन्हें इस कामसे न नफरत है, न जो इसे करते हुए ऊबते ही हैं, इसके द्वारा सुखपूर्वक अपना जीवन-निर्वाह कर सकते हैं। लेकिन अन्त्यज शालाओंके संचालनके लिए योग्य हिन्दू शिक्षक हमें कहाँ मिलते हैं? अन्त्यजोंके लिए कुएँ खोद देनेवाले लोग कहाँ हैं? रेलकी पटरियाँ बिछा देनेवाले साहसी कच्छियोंको जहाँ-तहाँ देखता हूँ, लेकिन बाजार-दरसे मजदूरी लेकर अन्त्यजोंके लिए कुएँ खोद देनेवाले कारीगर और ठेकेदार कहाँ हैं? अगर कोई शिक्षक, कारीगर, मजदूर और ठेकेदार इस कामको अपने हाथों लेना चाहें तो वे सब ठक्कर बापाको लिखें और उनके कार्यालयमें अपने नाम दर्ज करायें।