वहाँ मणिलाल मृत्यु-शय्यापर पड़ गया। फिर वहाँ रहना सम्भव नहीं था। बड़ी खोजबीनके बाद अन्तमें 'विलर-विला' पसन्द किया। किरायानामा लिखवाया। रेवाशंकरभाई भी साथ रहने आये। पहले दर्जेकी 'सीजन-टिकट' ली। बम्बईमें पेन गिल्बर्टके मकानमें आफिस लिया। सोचा, आखिर अब चैनसे ठिकाने पहुँच गये हैं। तभी तार आ गया : "दक्षिण आफ्रिका पहुँचो।" बा को छगनलालके पास छोड़कर, जो नवयुवक आना चाहते थे उन्हें साथ लेकर, दक्षिण आफ्रिका चला गया। वहाँ भी यही हाल हुआ। फरनीचरमें ही कितना पैसा बरबाद किया है, इसका आज अन्दाज लगाना कठिन है। किन्तु इन सारे तूफानोंमें किसी भी समय मनमें क्षोभ हुआ हो, ऐसा मुझे याद नहीं है। हर बार हलका हो जानेका ही अनुभव हुआ और 'ईश्वर यही चाहता है इसलिए अच्छा ही है' यही मनमें विश्वास रहा है।
इस आश्रमको भंग करके नया बनाऊँ तो इसमें मुझे तनिक भी दुख नहीं होगा। हाँ, मैं एक बातका भूखा हूँ, सत्यका। तुम सब सच्चे मनसे रह सको तभी रहो। लोग संकोच और दबावके कारण रहें तो वे भी सच्चे मनसे रहते हैं, ऐसा नहीं कहा जा सकता। सत्य कई बार निर्दय दिखाई देता है। तुम मेरे प्रति निर्दय होनेमें संकोच न करना।
चाहे जो सहना पड़े किन्तु सचाई न छोड़ो। एक पलके लिए भी कृत्रिम न बनो। कृत्रिमका अर्थ समझ लो। उसका अर्थ 'ढोंगी' नहीं 'अस्वाभाविक' है। तुम्हारी अन्तरात्मा कहे कि मुझे यह काम करना है, वही करना। उसीमें तुम्हारी भलाई है। इसीमें तुम्हारी जीत है। मुझसे तुम्हें यहीं सीखना है। हालाँकि थोड़े लोग ही इसे सीख पाये हैं। तुम्हें आश्चर्य होगा कि मगनलाल यह प्रमाणपत्र ले पाया था। तुम्हें याद होगा कि वह मेरे विरुद्ध सभामें भी किस तरह जमकर जूझता था। कई बार मुझे परेशान देखता; किन्तु मुझे सवेरे आकर कह जाता था, "बापू, तुमने यही सिखाया था न कि जो मैं ठीक न समझूँ उसमें तुम्हारा विरोध करूँ।" इतना कह कर चला जाता था। इसलिए मैं हँस कर शान्त हो जाता था। एक बार कताईके बारेमें हम दोनोंमें बहस हो गई। मैंने एक पक्षका समर्थन किया, उसने दूसरे पक्षका। मेरा कहना वह समझता ही न था; इसपर मैं परेशान हो रहा था और मेरा चेहरा देखकर वह परेशान हो रहा था। किन्तु उसने अपनी बात नहीं छोड़ी। अन्तमें मैंने देखा कि मेरा तर्क अनुभवाभावपर आधारित था। बात मामूलीसी थी किन्तु उसने देखा कि मेरा अनुचित लिहाज करनेसे मेरी भलाई नहीं होगी। ऐसी तो कई बातें मुझे याद हैं। उसने मुझे छोड़ा नहीं, इसका भी कारण है। यह उसने स्वयं अपने पत्रमें बताया था। मुझे उसकी कुछ याद न थी।
अब तुम्हें क्या लिखूँ? किस प्रकार आश्वासन दूँ कि तुम निर्भय बनो। जितना मैं निर्भय हूँ उतने ही तुम भी बनो। उसके लिए सिर्फ ईश्वरपर श्रद्धा होनेकी जरूरत है। हम क्या चीज हैं? एक काल्पनिक बिन्दु मात्र——जिसे पाटीपर बनाया भी नहीं जा सकता। वहीं सब कुछ है। 'सर्वत एव सर्व'[१] यह 'गीता'का वाक्य है न? तो
- ↑ अध्याय ११-४०।