३२९. पत्र : छगनलाल जोशीको
६ मई, १९२९
आजकी डाक तो ग्यारह बजे भेज दी; दोपहरको तुम्हारी डाक मिली। रमणीकलालको पत्र तो मैंने तुरन्त अलग लिफाफेमें भेज दिया था। वह न मिले, यह होना तो नहीं चाहिए। पता लगाना।
अक्याबका पैसा चरखा संघको दिया जायेगा। तुमने अक्याबवालोंको पैसेकी पहुँच तो लिख ही दी होगी। योगेन्द्रका जाना ठीक हुआ। सरोजिनी देवीका मामला कुछ कठिन है। यह बहन है तो बहुत अच्छी किन्तु बात-बातमें रो पड़ती है। पद्मा उसे काफी दुखी करती है।
राधा और रुखीको कहीं भेज सकनेका प्रबन्ध कर पाओ तो अच्छा है। किन्तु आसानीसे यह प्रबन्ध न किया जा सके तो वर्तमान स्थिति सहन कर लें। यह तो सही है कि जमनालालजी कुछ-न-कुछ करेंगे। इसका सुख है, पर दुख भी है। इस प्रकारकी सुविधाएँ प्राप्त हैं इसलिए उनका लाभ तो उठाना ही पड़ता है। ऐसा लाभ उठानेसे तो हम गरीब नहीं बच रहते; गरीबीका दिखावा-मात्र रह जाता है। यह मेरी दोहरी स्थितिका फल है। हमारे लिए आदर्श स्थिति तो यह है कि हम कहीं न जायें। जिस तरह गरीब व्यक्ति अपना गाँव छोड़कर नहीं जा सकता, उसी तरह हम भी अपना स्थान न छोड़ें और वहीं मरें। किन्तु क्या ऐसी मनःस्थिति जबरदस्ती बनाई जा सकती है? जब मैं देखता हूँ कि मेरे कारण पूरे घरकी व्यवस्था उलट-पुलट हो जाती है और मैं उसे सहन कर लेता हूँ तब क्या कहूँ? आज जिस घरमें हम लोग हैं, उसका मालिक मेरी सुविधाके ध्यानसे अपने घरमें कैदी ही बन गया है। मैं यह देख रहा हूँ और फिर भी वेंकटप्पैयाको प्राप्त सुविधाएँ पर्याप्त नहीं लगतीं।
बापूके आशीर्वाद
गुजराती (जी॰ एन॰ ५४१३) की फोटो-नकलसे।