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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 40.pdf/४०८

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

संस्था जो उपयोगी कार्य कर रही है उसके लिए मैं उसे बधाई देता हूँ और आशा करता हूँ कि वह निरन्तर प्रगति करेगी।

[अंग्रेजीसे]
यंग इंडिया', ९-५-१९२९
 

३४२. एक पेचीदा समस्या

रेवरेण्ड बी॰ द॰ लिग्टने अपने खुले पत्रमें युद्धके प्रति मेरे दृष्टिकोणके बारेमें एक प्रश्न पूछा है। बिलकुल निस्संकोच होकर मैं इसका उत्तर नहीं दे पा रहा हूँ। लोगों द्वारा गलत समझे जानेका खतरा उठाकर भी चुप्पी साधे रहना मेरे सामने आई इस कठिन परिस्थितिसे निकलनेका एक आसान-सा उपाय है, और यह स्वीकार कर लेना तो और भी आसान होगा कि उल्लिखित अवसरोंपर युद्धमें भाग लेकर मैंने गलती की थी। परन्तु इतने मैत्रीपूर्ण ढंगसे पूछे गये प्रश्नोंके उत्तर देनेसे कतराना एक अमैत्रीपूर्ण व्यवहार होगा, और फिर यह भी है कि यदि मैं हृदयमें कोई पश्चाताप महसूस नहीं करता तो मुझे उसका अभिनय नहीं करना चाहिए। मैं इस प्रश्न पर चर्चा करनेसे इसलिए नहीं कतराता कि मेरे अन्दर विश्वासका अभाव है; मैं इस आशंकासे कतरा रहा हूँ कि मैं शायद अपना अर्थ ठीक-ठीक नहीं समझा पाऊँगा और तब युद्धके प्रति मेरे दृष्टिकोणके बारेमें लोगोंके दिमागोंपर कुछ ऐसी छाप पड़ जायेगी जैसी कि मैं पड़ने नहीं देना चाहता। बहुधा मुझे लगता है कि मेरी कुछ मूलभूत भावनाएँ भाषाके माध्यमसे पूरी-पूरी अभिव्यक्ति नहीं पातीं। इसीलिए श्री बी॰ द॰ लिग्ट और अपने अन्य युद्ध-प्रतिरोधी सहयोगियोंसे मेरा अनुरोध है कि वे मेरे त्रुटिपूर्ण या अधकचरे तर्ककी चिन्ता न करें और यदि युद्धमें भाग लेनेके मेरे कार्यकी वे युद्ध-सम्बन्धी मेरे विचारोंके साथ पटरी न बैठा पायें तो उसकी भी बिलकुल कोई चिन्ता न करें। बस वे इतना समझ लें कि मैं सभी युद्धोंके सर्वथा विरुद्ध हूँ, हर हालत में विरुद्ध हूँ। यदि वे मेरे तर्कको समुचित नहीं मान सकते, तो युद्धमें मेरे भाग लेनेको वे मेरी ऐसी कमजोरी मान सकते हैं जो मुझसे अनजाने में हो गई है। इसलिए यदि कोई किसी भी परिस्थितिमें मेरे उस कार्यकी दुहाई देकर युद्धका औचित्य सिद्ध करनेकी कोशिश करेगा, तो मुझे हार्दिक दुख होगा।

परन्तु इतना कहनेके बाद मुझे उस लेखमें[] रखी गई अपनी बातपर दृढ़ रहना चाहिए जिसे श्री बी॰ द॰ लिग्टने अपने पत्रका विषय बनाया है। यूरोपीय युद्ध-प्रतिरोधियोंको यह समझना चाहिए कि मेरे और उनके बीच एक बड़ा महत्त्वपूर्ण अन्तर है। वे शोषित देशोंके प्रतिनिधि नहीं हैं, जबकि मैं संसारके एक सबसे अधिक शोषित देशका प्रतिनिधि हूँ। उपमा खटकनेवाली तो है, फिर भी कहा जाये तो वे यदि बिल्लीके प्रतिनिधि हैं तो मैं चूहेका प्रतिनिधि हूँ। क्या चूहेको अहिंसाका कोई

  1. देखिए खण्ड ३७, पृष्ठ २८१-८३ तथा खण्ड ३६, पृष्ठ ९१-९३ भी।