संग्रहकी रकममें मुझे कौड़ियाँ भी दिखाई पड़ीं। पूछनेपर मालूम हुआ कि वहाँ ५ कौड़ियाँ एक पैसेके बराबर होती हैं। फिर भी मैं खुले दिलसे इतना तो मंजूर करता हूँ कि इस 'फेरीवाले' (कृपलानी) की बातको सम्पूर्ण सत्य नहीं मान लेना चाहिए, क्योंकि इसने वर्षोंसे अपने आपको एक निष्कासितके रूपमें प्रान्तके बाहर रख छोड़ा है। साथ ही यह भी सच है कि अबतक सिन्धमें खादीके उत्पादनकी दृष्टि से जमकर गम्भीरतापूर्वक और नियोजित ढंगसे कोई प्रयत्न नहीं किया गया है और न किसी कुशल खादी-कार्यकर्ताका हाथ ही इस प्रयत्नके पीछे रहा है। इसके साथ ही यह भी खयाल कीजिए कि सिन्ध एक कपास पैदा करनेवाला प्रान्त है और यहाँ अनिवार्य प्रारम्भिक शिक्षाका नियम जारी है, जैसा कि हैदराबादमें है। अगर सिन्धमें खादीके अनुकूल वायुमण्डल होता तो वहाँकी पाठशालाओं द्वारा यज्ञार्थ खादी हमेशा तैयार की जा सकती थी। अगर केवल सिन्धकी पाठशालाओंमें ही उचित देखभालके साथ नियमित रूपसे प्रतिदिन सूत कतवाया जाये तो भी वहाँ अच्छी, टिकाऊ और सस्ती खादी बड़ी मात्रामें तैयार हो सकती है। कालेजोंका तो मैं जिक्र ही नहीं कर रहा हूँ। लेकिन जहाँ श्रद्धाका अभाव होता है वहाँ असंख्य शंकाएँ राज करती है।
कांग्रेसकी हालत
कोटरी कांग्रेस-कमेटीके साहसी अध्यक्षने वहाँकी सार्वजनिक सभामें मुझे बताया कि उनके कांग्रेस-सदस्योंकी सूचीमें केवल २० सदस्योंके नाम हैं और अगर खादी-मताधिकारका ईमानदारी और कड़ाईसे पालन करवाया जाये तो शायद वहाँ दो से ज्यादा सदस्य न रह पायें। इसके जवाबमें मैंने एक बहुत सीधी-सादी बात कही। वह यह कि अध्यक्ष महोदय खादी-मताधिकारका प्रामाणिक पालन करवानेके लिए बँधे हुए हैं और उनका कर्त्तव्य है कि वह कार्य-समितिको अपना विवरण लिख भेजें, और अगर उन्हें खादीमें विश्वास है तो उन्हें अकेले ही डटे रहने में हिचकना नहीं चाहिए।
सिन्धके दूसरे भागोंमें भी कांग्रेस संगठनकी यही हालत है। हर जगह कांग्रेसका काम नाम-मात्रको चल रहा है। कवि तुलसीदासके शब्दोंकी व्याख्या-रूपमें यों कह सकते हैं कि इधर नामधारीके मुकाबले उसके नामका महत्त्व ज्यादा बड़ा है। आज कांग्रेसकी जो हालत है वह बड़ी दयनीय-सी है; जीवनके हर पहलू और समाजके हर अंगमें उसका प्रसार होनेके बदले कांग्रेस अब केवल किसी राजनीतिक उथल-पुथलके अवसरोंसे ही सम्बन्धित रह गई है। सारांश यह कि इस रेतीले मैदानवाले प्रदेशमें कांग्रेसने न तो किसी तरहकी तरक्की करके दिखलाई है और न कोई रचनात्मक कार्य ही वह कर रही है। शायद दूसरे प्रान्तोंकी भी बहुत-कुछ यही हालत होगी। इसलिए मेरे विचारमें कांग्रेसके राजनीतिज्ञोंके सामने बड़ीसे-बड़ी समस्या तो यह है कि वे किसी तरह कांग्रेसको वैसी ही प्रतिष्ठा और प्रभुत्व प्रदान करायें जैसी कि उसे सन् १९२१ में प्राप्त थी। मैं निःसंकोच होकर यहाँ यह कह देता हूँ कि अगर इस कार्यमें खादी-मताधिकार बाधक होता हो तो बिना किसी संकोचके खादी-मताधिकारको कांग्रेस-संगठनकी वेदीपर बलि चढ़ा देना चाहिए और हर तरह कांग्रेस-क्षेत्रसे पाखण्ड,