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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 40.pdf/४१४

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३४६. महादेव देसाईको लिखे पत्रका अंश

शुक्रवार, १० मई, १९२९

आश्रमके विषयमें तुम्हें जो प्रस्ताव पेश करने हों या फेरफार करने हों उन्हें साहसपूर्वक पेश करो। मैं भी आश्रम चलानेमें यही बात करता रहा हूँ न? जिन्हें काम सौंपता हूँ, उन्हें अपनी शक्ति और इच्छाके अनुसार काम करने देता हूँ और उनके काममें दखल नहीं देता। इस प्रकार आश्रमके रूपमें हम विशुद्ध 'डेमोक्रेसी' (प्रजातन्त्र) का प्रयोग कर रहे हैं। यह बहुत जल्दीमें लिख रहा हूँ।

बापूके आशीर्वाद

[गुजरातीसे]
बापुना पत्रो-७ : श्री छगनलाल जोशीने
 

३४७. भाषण : सार्वजनिक सभा, बुचिरेड्डीपालममें[]

१० मई, १९२९

मुझे सूचना मिली थी कि बुचिरेड्डीपालम पूरे आन्ध्र देशमें सबसे अधिक समृद्ध नगर है। सरकारकी भाँति मेरे भी अपने गुप्तचर हैं। (हँसी) सरकारके सद्गुणोंका,——यदि उसमें सचमुच कोई सद्गुण हैं——मैं चाहे अनुसरण न भी कर पाऊँ पर इस मामलेमें कमसे-कम उसकी बुराइयोंको तो अपना ही सकता हूँ। मेरे गुप्तचरोंने मुझे पूरा यकीन दिला दिया है कि इस नगरसे मुझे कमसे-कम दस हजार रुपये मिलने ही चाहिए। अतः आप लोगोंको बकाया राशि भर देनी चाहिए। मैं तो भारतके करोड़ों भिखमंगोंकी ओरसे एक भिक्षुक ही हूँ और मैं उस दरिद्रनारायणके लिए भिक्षा माँगता फिर रहा हूँ जो तबतक सन्तुष्ट नहीं होगा जबतक आप अपनी शक्तिभर दान नहीं देंगे। मैं १९२१ में नेल्लोर आया था और आप सब लोगोंको शायद दक्षिणा-मूर्ति हनुमन्त राव नामक व्यक्तिका स्मरण होगा, जो मेरे लिए पुत्रवत् था और जिसके प्रयासके फलस्वरूप ही पल्लिपाडका सत्याग्रह आश्रम शुरू किया गया था। उसने अपना सारा जीवन इसीके लिए उत्सर्ग कर दिया। मैंने स्वयं अपनी आँखोंसे देखा है। मैं इस बातका गवाह हूँ कि उसने पल्लिपाडमें अस्पृश्यताकी समस्याके हलके सिलसिलेमें वहाँ सत्याग्रह किया था। मैंने अबतक श्री सी॰ वी॰ कृष्णके अतिरिक्त अन्य किसी भी व्यक्तिको आश्रममें दिलचस्पी लेते और उसके लिए लगातार काम करते नहीं देखा। मेरी बड़ी कामना है कि हनुमन्त राव द्वारा शुरू की गई संस्थाको

  1. सभामें गांधीजीको सात हजार रुपयोंकी थैली भेंट की गई थी।