३४९. पत्र : माधवजी वी॰ ठक्करको
[१० मई, १९२९ के पश्चात्][१]
तुम्हारा १० तारीखका पत्र मिल गया है।
सोडा नींबूके साथ ही लिया जा सके, ऐसी कोई बात नहीं है। सोडा और नींबू एक साथ लेनेका सुझाव इस कारणसे दिया था कि उससे अन्न पचानेवाला पेय पदार्थ प्राप्त हो जाता है; किन्तु अम्ल पदार्थ चूँकि तुम्हें माफिक नहीं आता इससे नींबू अलग लेनेका सुझाव दिया है। फिर भी शाकके साथ नींबू जरूर ले सकते हो और सोडा अलगसे पानीमें मिलाकर ले सकते हो।
हापुस आमका सुझाव भी खटाईसे बचनेकी खातिर दिया है। लँगड़ा ले सकते हो। इस समय एक या दो आम लेनेसे कोई हानि नहीं होगी। प्रयोग करना चाहो तो करके देखो।
मक्खन दो-एक सप्ताह न लेना ही अच्छा है। मक्खन अच्छी डेरीका हो या घरमें निकाला हुआ हो तो दोनोंमें अन्तर नहीं होता, होना नहीं चाहिए। घरमें निकाले हुए मक्खनमें खटास हो तो उस हदतक वह सदोष माना जायेगा।
तुम्हें आजकल नींद आती है, इतना ही काफी है।
मक्खन रोटीके साथ खाया जा सकता है; दूधमें डालकर भी लिया जा सकता है।
मोहनदासके वन्देमातरम्
गुजराती (जी॰ एन॰ ६७८३) की फोटो-नकलसे।
३५०. पत्र : मीराबहनको
११ मई, १९२९
मैं आबादीसे दूरके एक स्थानमें पंखेके नीचे हूँ। परन्तु हवा गरम चल रही है, और हमें ८० मीलकी यात्रापर साढ़े ५ बजे रवाना हो जाना है। इमाम साहबके स्वास्थ्यने लगभग जवाब दे दिया है। वह किसी तरह अपनेको खींचे चल रहे हैं। प्रभावतीपर भी गरमीका प्रभाव हो रहा है। मैं प्रार्थना कर रहा हूँ कि इन आखिरी दस दिनोंमें हम टिके रहें। आशा है रुके रहनेके आघातके असरसे अब तुम
- ↑ यह माधवजीके १० मई, १९२९ के पत्रके उत्तरमें लिखा गया था।