सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 40.pdf/४२

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
१२
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

अप्रामाणिकता तथा खोखलापन उठ जाना चाहिए। मेरी अपनी राय तो यह है कि स्वयं संगठनकर्त्ताओं और नेताओंमें खादीके प्रति पूर्ण विश्वास नहीं है। लेकिन मेरी रायका उस प्रत्यक्ष प्रमाणके सामने, अगर सचमुच वह प्रत्यक्ष है, कोई मूल्य नहीं रह जाता, जिसके अनुसार कहा जाता है कि खादी-मताधिकारकी योजना असफल हुई है। फिर भी इस सम्बन्धमें अपनी यह राय देनेके साथ ही मैं एक दूसरी राय भी प्रकट कर देता हूँ और वह यह है कि खादी-मताधिकारको निकाल दें तो भी हमें कोई बहुतसे ऐसे लोग नहीं मिल जायेंगे जो कांग्रेसके सदस्य बननेको लालायित होंगे।

कांग्रेसके झगड़े

सिन्धमें कांग्रेसके पतनका मूल कारण उसके आन्तरिक झगड़े हैं। मुझे आशा नहीं थी कि उन्हें मिटानेके लिए मुझे बुलाया जायेगा। लेकिन बात ठीक यही हुई और इसपर श्रीयुत मणिलाल कोठारीको कार्य-समितिने चुनाव वगैरा का निरीक्षण करनेके लिए नियुक्त किया। उन्होंने इस कामके साथ-साथ लालाजी-स्मारक-कोषके संग्रहका काम भी हाथमें ले लिया। इस कारण मैं भी सहज ही इस फन्देमें फाँस लिया गया। जहाँ-जहाँ मैं गया वहाँ-वहाँ कार्यकर्त्ताओंसे शान्तिपूर्वक बातचीत करनेके लिए एक घण्टेका समय अलग निकाल लिया गया था। हर जगहकी बातका सार लगभग एक ही था : 'हमारे झगड़े कांग्रेसके काममें बाधक हो रहे हैं। कृपया सिन्ध छोड़नेसे पहले आप उन्हें निपटाते जाइए।' झगड़ेका कारण मेरी रायमें एक मामूली-सी बात थी, यानी अधिकारोंका बँटवारा। लेकिन दुःख तो इस बातका है कि वहाँ कोई ऐसे अधिकार ही नहीं हैं, जो बाँटने योग्य हों; न कोई कोष है और न किसी चीज की संरक्षाका सवाल है। सब मिलाकर सिन्धके कांग्रेस-सदस्योंकी संख्या मुश्किलसे ४०० है। ४५ सदस्य प्रान्तीय कमेटीके हैं। कार्य-समितिके १५ सदस्य हैं, जो मेरी रायमें काफीसे ज्यादा है। अगर केन्द्रीय संस्थाका काम १५ सदस्योंसे भलीभाँति चल जाता है तो प्रान्तीय संस्थाको ५ सदस्योंसे काम निकाल लेना चाहिए। लेकिन अभी हममें वह व्यवहार-कुशलता नहीं आई है, जिससे हम तमाम सम्भव उत्साह, धन और समयकी बचत कर सकें।

सिन्धमें कांग्रेसके दो दल हैं। दोनोंका ज्यादातर ध्येय कार्यकारिणोपर अपना प्रभुत्व जमानेका है। कार्यकर्त्ताओंमें से हरएकने मुझसे कहा कि सिन्ध कांग्रेसका प्रान्तीय संगठन, जो किसी समय बहुत समरस था, उस समय टुकड़े-टुकड़े हो गया, जब बदनसीबीसे कौंसिल प्रवेशका सवाल एक सजीव समस्या बना। सिन्धको अलग प्रान्त बनानेके नये सवालने इस भेदको और भी पुष्ट कर दिया। एक दलके मुखिया स्वामी गोविन्दानन्द हैं और दूसरेके श्री जयरामदास। स्वामी गोविन्दानन्द पिछले तीन या उससे ज्यादा साल (मुझे याद नहीं कितने) से अध्यक्ष रहे हैं। श्री जयरामदासके दलने कई अनियमित बातोंकी निश्चित शिकायतें की हैं। लेकिन मैंने इनकी जाँच नहीं की। जब मीरपुर-खासमें दोनोंके प्रतिनिधियोंसे मुझे आखिरी बातचीत करनेका मौका मिला, तो मैंने दोनोंको समझाने और परस्पर मिलानेकी कोशिश की। वहाँकी स्थितिको देखने-भालनेके बाद मैंने एक समझौता पेश किया जो, मेरी रायमें, एक