३६१. पत्र : मीराबहनको
१४ मई, १९२९
तुम्हारा १० तारीखका पत्र मिला। तुम्हारे सारे पत्र मिल गये, पर इतनी देरसे कि मैं जीरादेईके पतेपर एक भी पत्र नहीं भेज सका। तुम्हारा तार पाकर मैंने सदाकत आश्रमके पतेपर पत्र भेजने शुरू किये थे। आशा है उस पतेपर भेजे सभी पत्र तुमको मिल गये होंगे।
बापू
सौजन्य : मीराबहन
३६२. आन्ध्र देशमें [—५]
निम्नलिखित यात्रा-विवरणसे पाठकोंको इस बातका अन्दाजा मिल जायेगा कि पिछले सप्ताह हम कहाँ-कहाँ गये और कहाँ-कहाँसे कितना-कितना चन्दा मिला।
'यंग इंडिया' में कुल रु॰ १,५४,९६१–१५–०½ की प्राप्ति तो पहले ही स्वीकृत की जा चुकी है।[१]
इस यात्राके क्रममें एकके बाद एक घटनाओंकी ऐसी भीड़ लगती चली गई है कि उन सबके बारेमें लिखना या इसके लिए उनमेंसे कुछ खास घटनाओंको चुन सकना कठिन है। इसलिए मुझे कतिपय बहुत ही महत्त्वपूर्ण घटनाओंकी मोटी रूप-रेखा बताकर ही सन्तोष करना पड़ेगा।
अस्पृश्यता
अस्पृश्यताका यह घातक साँप जख्मी तो जरूर हुआ है, लेकिन अभी यह मरा नहीं है। जब आप इसकी बिलकुल उम्मीद नहीं कर रहे हों, तब भी यह अपना विषदन्त दिखाता है। निश्चय ही, मैंने निम्नलिखित पत्र प्राप्त करनेकी आशा नहीं की थी :
बड़े दुःखके साथ मैं निम्नलिखित तथ्य आपके ध्यानमें ला रहा हूँ। यह बात उस समयकी है जब इसी महीनेकी २२ तारीखको तनकूमें आयोजित
- ↑ इसके बाद पूर्वी गोदावरी जिलेके विभिन्न गांवोंमें प्राप्त चन्देकी रकमका ब्योरा दिया गया था। चन्देकी रकमका कुल जोड़ २,०१,७९२ रु॰ १४ आ॰ ३ पा॰ था।