महिलाओंकी सभा अभी खत्म ही हुई थी। ५ बजे शामके आसपास सभामें कोई तीन-चार सौ महिलाएँ उपस्थित थीं। इसी बीच किसीने कानाफूसी की कि आपकी बगलमें बैठी युवती पंचम वर्णकी थी।
ज्यों ही सभा खत्म हुई, उसमें मौजूद सारी महिलाएँ सीधे नहरके पास पहुँची और अपने-आपको एक अस्पृश्यका स्पर्श करनेके अक्षम्य पापसे शुद्ध करनेके लिए उसमें स्नान किया। मैंने अपनी आँखों देखा कि छोटे-छोटे बच्चों पर——और उन्हीं पर क्यों, दुधमुँहे बच्चों तक पर पवित्र जल छिड़का गया ताकि उन्हें इस पापसे बचाया जा सके। एक ओर हम आपको छलते हैं और दूसरी ओर सम्मानित करते हैं। हमारा यह पुरातन पाखण्ड है।...
लोग अज्ञान और अन्धविश्वासमें डूबे हुए हैं, और इस अज्ञान और अन्धविश्वासके साथ मिलकर उच्च वर्णवालोंका अहंकार ही हमें चला रहा है और यह वर्तमान सरकारसे भी अधिक शक्तिशाली प्रतीत होता है।
मगर सचाई यह थी कि मेरी बगलमें बिहारके प्रसिद्ध नेता ब्रजकिशोर बाबूकी पुत्री श्रीमती प्रभावती देवी बैठी हुई थीं। वे कुछ दिनोंसे मेरे साथ आश्रममें हैं और आन्ध्रके दौरेमें मेरे साथ यात्रा कर रही हैं। अधिकांश लोगोंने उन्हें मेरी पुत्रीके समान माना है, कुछ लोगोंने उन्हें मेरी पुत्र-वधूके समान माना है, लेकिन अब यह तनकूकी महिलाओंके लिए रह गया था कि वे उन्हें अन्त्यज लड़की लक्ष्मी मानें, जिसे मैंने अपने ही तरीकेसे अपनी पुत्री बना लिया है; और इसलिए वे सब मेरे जरिये उस काल्पनिक अन्त्यज लड़कीकी छूत लग जानेसे अपवित्र हो गई और फलस्वरूप उन भली महिलाओंने खुद पवित्र जलसे स्नान करके और अपने बच्चोंको स्नान कराकर या उनपर जल छिड़ककर अपने-आपको और उन्हें भी शुद्ध किया। इस हास्यास्पद किन्तु दुखद घटनासे हमें एक सबक मिलता है। पुरुष खुद ही अन्धविश्वासी हैं और इसलिए उन्होंने महिलाओंको जागृत करनेकी ओर कोई ध्यान ही नहीं दिया। फलतः महिलाएँ अन्धविश्वासके और भी गहरे अन्धकारमें डूबी हुई हैं। इस पत्रको पानेके बाद मैं सावधान हो गया और आगे जो सभाएँ हुईं उनमें उपस्थित होनेवाले श्रोताओंकी जाँच करने लगा। मैंने पाया कि अधिकांश सभाओंमें अस्पृश्य और सवर्ण लोग साथ ही बैठाये गये थे। मैंने श्रोताओंसे साफ शब्दोंमें पूछा कि क्या उन्हें बैठनेकी इस व्यवस्थापर कोई आपत्ति है। उन्होंने कहा कि उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। राजमुंदरीके पास एक गाँवमें एक बड़ी ही सुव्यवस्थित सभामें मैने स्वयंसेवकोंको अपने-अपने हलकेके अस्पृश्यों, सवर्णों और महिलाओंकी ओर बड़ी शानसे इंगित करते देखा। मैंने उन्हें झाँसा देकर पूछा : "मेरा खयाल है, आप लोगोंने अस्पृश्योंको अलग बैठानेके लिए विशेष रूपसे यह व्यवस्था की है?" मेरे प्रश्नका उत्तर देनेवाला बेचारा स्वयंसेवक झाँसेमें आ गया और उसने कहा, "हाँ साहब।" बादमें मुझे पता चला कि वह अंग्रेजी बहुत कम जानता था और उसने मेरा सवाल नहीं समझा था। क्योंकि मैंने श्रोताओंसे सीधे पूछा कि क्या आप लोगोंको इसपर कोई आपत्ति है कि