सन्निहित थी कि दक्षिण आफ्रिकामें ब्रिटिश भारतीयोंकी स्थितिमें सुधार करके उनको समान दर्जा दिलाया जाये। परन्तु यदि उनकी रोजी-रोटीका एकमात्र साधन भी उनसे छीन लिया जाये तो इन व्यापारियोंके लिए समानताका कोई अर्थ ही नहीं रह जायेगा। इसलिए जरूरी है कि हमारे देशका लोकमत इन व्यापारियोंकी संरक्षण पानेकी माँगको फलीभूत बनानेमें दक्षिण आफ्रिका-स्थित भारत सरकारके प्रतिनिधि और भारत सरकारके हाथ मजबूत करे। मैं जानता हूँ कि इस काममें मुश्किलें हैं। दक्षिण आफ्रिकामें आम चुनाव होनेवाले हैं। संघके मन्त्रियोंको यदि अपने मनकी करनेकी छूट दी जाये तो वे शायद संरक्षण देना मँजूर कर लेंगे और संरक्षण है भी अत्यन्त वांछनीय। और यदि केपमें हुए समझौतेको सम्मानपूर्ण ढंगसे निभाना है तो ऐसा संरक्षण देना अनिवार्य माना जाना चाहिए। परन्तु दक्षिण आफ्रिकामें चुनावको परिस्थितियाँ संसारके अन्य भागोंकी परिस्थितियोंसे अधिक भिन्न नहीं हैं। परन्तु परिस्थिति कितनी ही जटिल हो, इन व्यापारियोंको तो संरक्षण मिलना ही चाहिए। एक नया कानून बनानेके अतिरिक्त, एक सर्वथा उचित, वैध और सरल दूसरा भी मार्ग मौजूद है जिससे इस समस्याको हल किया जा सकता है। ट्रान्सवालमें १८८५ का कानून ३ अभी भी लागू है। स्वर्ण-कानून इसको रद नहीं करता। इसलिए स्वर्ण-कानूनको ट्रान्सवालके १८८५ के कानूनके साथ रखकर पढ़ना और उसका अर्थ लगाना पड़ेगा। वह कानून सरकारको यह शक्ति प्रदान करता है कि वह भारतीयोंके बसने और व्यापार करनेके लिए कुछेक हलकों, सड़कों और बस्तियोंको उचित घोषित कर सकता है। इसलिए संघ सरकार चाहे तो प्रशासकीय तौर पर ऐसे क्षेत्रोंकी घोषणा कर सकती है जहाँ भारतीय इस समय भी व्यापार कर रहे हैं। वह उन क्षेत्रोंको भारतीयोंके निवास और व्यापारके लिए उचित करार दे सकती है।
अन्य कुछ मामले भी इतने ही नाजुक हैं, लेकिन इस समय उनका उल्लेख करना जरूरी नहीं है क्योंकि उनको लेकर कोई फौरी खतरा नहीं है; और इस समय सबसे ज्यादा जरूरत इसी बातकी है कि सारा लोकमत इसी एक तात्कालिक खतरेपर केन्द्रित करके उसे एक निश्चित रूप दिया जाये।
यंग इंडिया, १६-५-१९२९