३६५. करनेका ढंग
आन्ध्र देशमें मुझे जो मानपत्र मिले हैं, उनमें से एककी कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं :
- हमें यह स्वीकार करते हुए दुःख होता है कि अस्पृश्यता-निवारण, नशाबन्दी-प्रचार और हिन्दी-प्रचारमें से कोई एक भी काम ऐसा नहीं, जिसे करनेका हम दावा कर सकें। हम आपसे मदद और रहनुमाईकी प्रार्थना करते हैं और आशा रखते हैं कि आप हमें कुछ ऐसे उपाय बतलायेंगे जिनके द्वारा हम उक्त कामोंके लिए आवश्यक धन और निःस्वार्थ कार्यकर्त्ता पा सकें।
यह एक ऐसी बेबसीकी स्वीकारोक्ति है, जिसे दुनियाके दूसरे हिस्सोंमें बसनेवाले लोग शायद मुश्किलसे समझ सकेंगे। क्योंकि मुझसे न केवल आवश्यक धन-प्राप्तिका तरीका बतानेको कहा गया है, बल्कि निःस्वार्थं कार्यकर्त्ताओंके संग्रहका उपाय भी पूछा गया है। इस मानपत्रके देनेवाले वे लोग हैं, जो अपने आपको 'आपके (मेरे) अत्यन्त विश्वासपात्र एवं अत्यन्त विनम्र अनुयायी, नगर कांग्रेस कमेटीके सदस्य' कहते हैं। अगर कोई मेरे 'विश्वासपात्र और विनम्र' अनुयायी हैं, तो मैं सबसे पहले उनसे निःस्वार्थ होनेकी आशा रखता हूँ। कांग्रेस कमेटियोंके जो सदस्य निःस्वार्थ नहीं हैं, वे कांग्रेस कमेटियोंमें बैठनके भी अयोग्य हैं। मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि आज कांग्रेस कमेटियोंमें भी पदाधिकार पानेके लिए अशोभनीय स्पर्धा चल रही है। परन्तु यह तो हरएक कांग्रेसी मँजूर करेगा कि अगर कांग्रेसका प्रतिनिधि निःस्वार्थ नहीं है, तो वह कुछ भी नहीं है। और अगर "सूर्य ही प्राण-पोषण करना छोड़ देगा तो दुनिया 'प्राण' किससे पायेगी?" अगर मेरे अनुयायी और कांग्रेस कमेटीके सदस्य ही निःस्वार्थ नहीं हैं तो फिर मैं इन लोगोंके लिए निःस्वार्थ सेवक या कार्य-कर्त्ता कहाँ पा सकूँगा? इसलिए इन प्रश्नकर्त्ताओंको निःस्वार्थ सेवक या कार्यकर्त्ता पानेका जो एक मार्ग मैं बता सकता हूँ, वह है, 'आप स्वयं निःस्वार्थ कार्यकर्त्ता बनो, मैं आपको वचन देता हूँ कि आवश्यक धन अपने-आप आपके पास चला आयेगा।' बिना सूर्यके छाया रह नहीं सकती। धन कमाना आदमीका काम है। धनसे आदमी पैदा होनेकी बात कभी सुनी नहीं गई है। हाँ, सम्भव है धनसे भाड़ेके टट्टू मिल भी जायें, लेकिन उनसे न तो अछूतोद्धारका काम हो सकेगा, न नशा-बन्दीका कार्य आगे बढ़ सकेगा और न सच्चा हिन्दी-प्रचार-कार्य ही हो सकेगा। इसमें शक नहीं कि दुनियाके अर्थशास्त्रमें भाड़ेके टट्टुओंका भी अपना एक स्थान है, लेकिन उनका आगमन सुधारके बाद होता है। स्वयं वे किसी तरहका सुधार नहीं कर सके हैं। अतः कांग्रेसजनोंको तिहरा सुधार सफल बनाना है। जब छुआछूत देशमें बीते जमानेकी बात बन जायेगी, जब नशाबन्दी आन्दोलन एक लोकप्रिय आन्दोलन बन जायेगा और जब हरएक स्त्री-पुरुष हिन्दी पढ़ना चाहेगा, तब उन लोगोंकी कोई कमी न रहेगी