जो किरायेपर काम करना चाहेंगे और उस कामको पूरा कर सकेंगे जो सर्वथा जोखिमसे परे है।
लेकिन दुर्भाग्यवश इन यात्राओंमें मैं बराबर यह देख रहा हूँ कि बहुतसे कांग्रेसजन रचनात्मक कामकी उतनी परवाह नहीं करते जितनी परवाह वे लोगोंमें उत्तेजना फैलानेवाले और सहज ही अपने आपको लोगोंमें प्रतिष्ठित बना देनेवाले कामकी करते हैं। कार्यकर्त्ताओंकी लगातार आमदका रास्ता खोलनेके लिए पहले इस मनोवृत्तिको बदलना आवश्यक है। मैं जहाँ जाता हूँ वहाँ अपने चारों ओर चतुर, चुस्त व तन्दुरुस्त स्वयंसेवकोंको खड़ा पाता हूँ, जो मुझे सुख पहुँचानेकी इच्छासे हर तरहका कष्ट सहनेको तैयार रहते हैं और सेवा-भावनासे प्रेरित होकर लगातार रात-दिन काम करते नहीं थकते। अगर इन लोगोंकी एक व्यक्ति-विशेषके प्रति इस भक्तिको उस कार्यके प्रति भक्तिमें बदला जा सके, जिसका वह व्यक्ति प्रतिनिधि है, तो यह समस्या हल हुई समझिए। जिस व्यक्तिके प्रति इतनी प्रचण्ड सेवा-भावनाका प्रदर्शन किया जाता है, उसे तो उसकी जरूरत नहीं है, उलटे वह तो इस सेवा-भावके प्रदर्शनसे दुखी होता है, मारे शर्मके गड़ जाता है। मैं जहाँ जाता हूँ कार्यकर्त्ताओंकी सभा बुलाता हूँ। मेरे विचारमें जो काम हमें करना है उसके लिए उतने कार्यकर्त्ता काफी होते हैं, बशर्ते कि वे उसे करनेमें सच्चे दिलसे लग जायें। लेकिन ये ही कार्यकर्त्ता उक्त मानपत्र-जैसे मानपत्रोंकी रचना करते हैं और इन शान्त सभाओंमें मुझसे धन और जनकी प्राप्तिके उपाय पूछते हैं। अतः मैं प्रत्येक कांग्रेस कमेटीके सामने यह सूचना पेश करता हूँ कि वह अधिक व्यवहार-कुशल बने और सच्चे कार्यकर्त्ताओंको चुन-चुन कर उनके वेतनकी रकम निश्चित कर दे और इस तरह रचनात्मक कामके चक्रको चलाती रहे। इस कामके लिए कांग्रेसकी उपसमितियाँ प्रान्तीय या केन्द्रीय संस्थाओंकी रहनुमाईकी प्रतीक्षा न करें। प्रान्तीय संस्थाएँ अपने प्रान्तीय सेवा मण्डल रखें या न भी रखें। यह हो सकता है कि उनका बोझ इतना ज्यादा बढ़ जाये कि वे इस तरहका कोई प्रयत्न न कर सकें; लेकिन ताल्लुका या ग्राम कांग्रेस कमेटियोंके बारेमें ऐसी कोई सम्भावना नहीं है। वे एकदम स्वावलम्बी हैं। वे धन-संग्रह करने और अपनी पसन्दके सुधारोंको लागू करनेके लिए सर्वथा स्वतन्त्र हैं। आन्ध्र देशकी इस दिलचस्प यात्रामें मैंने कहीं-कहीं कुछ सुयोग्य समितियोंको वह काम करते पाया है, जिसकी अन्य समितियोंने बुरी तरह उपेक्षा की है।
कांग्रेसीजन १९३० का ध्यान धरना छोड़ दें। १ जनवरी, १९३० के दिन कोई जादुई चमत्कार नहीं होगा। मुहलत और तैयारीके इस सालमें जितना राष्ट्रीय काम हो सकेगा, १ जनवरी उसीका सच्चा प्रतिबिम्ब होगी। पहली जनवरीको सारे राष्ट्रमें एकाएक कोई परिवर्तन हो जानेकी कोई सम्भावना नहीं है। इसलिए कांग्रेसका प्रत्येक सदस्य इस वर्ष जितना काम कर सके, करे और बखूबी करे। ऐसे लोग ही राष्ट्रको जागृत कर सकेंगे। उन्हें यह नहीं सोचना चाहिए कि किसी राष्ट्र या ध्येयके लिए एक आदमीके किये कुछ नहीं हो सकता। दुनियामें जितने भी काम होते हैं, वे सब व्यक्तियोंके समुदाय द्वारा किये जाते हैं। किसी-न-किसी एक व्यक्तिको शुरुआत तो