विदेशी वस्त्रका बहिष्कार
विदेशी वस्त्र-बहिष्कार समितिने नीचे लिखा सूचना-सार[१] प्रकाशित किया है। आशा है, दूसरी म्युनिसिपैलिटियाँ और लोकल बोर्ड इससे प्रेरणा पाकर काम करेंगे।
मोटी खादी
विदेशी वस्त्र-बहिष्कार आन्दोलनके कारण खादीके उत्पादन और बिक्रीकी मात्रा सहज ही बढ़ गई है। मगर यदि खादीके उत्पादनको असीमित बनाना है, तो थोड़े समयके लिए खादीकी अच्छाईमें तो फर्क अवश्य पड़ेगा। अखिल भारतीय चरखा संघ अपने शान्त प्रयत्न और प्रयोगोंके कारण खादीकी सुन्दरता, और उसकी बनावट वगैरामें लगातार प्रगति करता गया है। लेकिन जब कार्यकर्त्ता कच्चे या नौसिखुए कतैयोंके पास जायें और उनसे सूत तलब करें तब कोई खास शर्तें उनपर न लादें। नौसिखुए कातनेवाले आरम्भमें एकदम महीन और इकसार सूत नहीं कात सकेंगे। इसलिए अगर जनता खादी-आन्दोलनको और उसके द्वारा लाखों भूखों मरनेवालोंको मदद पहुँचाना चाहती है तो उसे चाहिए कि वह खादी-आन्दोलनके प्रत्येक नये दौर और प्रत्येक नये विकासके मौकेपर थोड़े समयके लिए मोटी-झोटी खादी पहनकर ही सन्तोष कर ले। विदेशी वस्त्र-बहिष्कारको सफल बनानेके लिए या भारतके गरीबोंकी मददके लिए मोटी-झोटी खादी पहनकर रहना कोई इतना बड़ा त्याग तो नहीं है।
अ॰ भा॰ च॰ संघकी सदस्यता
पाठकोंने पिछले हफ्तेके 'यंग इंडिया' के अंकमें अ॰ भा॰ च॰ संघ द्वारा प्रकाशित यह सूचना देखी होगी कि उसने 'बी' श्रेणीकी सदस्यता समाप्त करनेका निश्चय कर लिया है। मैं इसे एक सही कदम मानता हूँ। 'बी' श्रेणीकी सदस्यता उन लोगोंको अँटानेके लिए ही चालू की गई थी जो हर महीने एक हजार गज हाथ-कता सूत तैयार करके संघको भेजनेमें अपनी असमर्थता प्रकट करते थे। लेकिन हमारा अनुभव यह रहा है कि प्रतिवर्ष दो हजार गज सूत कातनेकी शर्तपर दी जानेवाली इस 'बी' श्रेणीकी सदस्यताका लाभ कोई बहुत ज्यादा लोगोंने नहीं उठाया। और फिर जब संघकी कार्यकारी परिषदके लिए सदस्योंके निर्वाचनमें मर्यादित अधिकार दिये जानेकी घोषणा की गई तब तो फिर 'बी' श्रेणी की सदस्यताका अटपटापन और भी उभर कर सामने आ गया। मतदानका अपना अधिकार बनाये रखनेके लिए 'ए' श्रेणीके सदस्य बारम्बार आग्रह करने लगे कि उनको 'बी' श्रेणीमें रख दिया जाये। परिषद नहीं चाहती थी कि वह मतदानके लिए निश्चित किये गये अपने नियमोंसे मुकरे। इसलिए मूल सूचीमें तो कोई संशोधन-परिवर्तन नहीं किया गया,
लेकिन यह तय कर लिया गया कि आगेसे सदस्योंकी केवल 'ए' श्रेणी ही रखी जाये। और चूँकि अखिल भारतीय चरखा संघकी नीति प्रारम्भसे ही केवल उन
- ↑ यह यहाँ नहीं दिया गया है।