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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 40.pdf/४५३

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पत्र : आश्रमकी बहनोंको

ट्रेनमें शोर होता रहा। तीसरे दर्जेकी भीड़में महात्माको भी थोड़ी तकलीफ सहनी पड़ती है, ऐसा कह सकते हैं। प्रभावती अपने शरीरकी देखभाल कर सकेगी या नहीं, यह देखना बाकी है।

कुछ भी हो, अगली बार यात्रापर तो तुझे साथ रखूँगा ही। कैसे सहन कर सकोगी, यह देखना होगा।

सुलोचनाबहन आनन्दसे होंगी।

बापूके आशीर्वाद

गुजराती (जी॰ एन॰ १७९१) की फोटो-नकलसे।

 

३८२. पत्र : आश्रमकी बहनोंको

कुरनूल
मौनवार, २० मई, १९२९

बहनो,

आशा तो यह है कि इस सफरका मेरा यह आखिरी पत्र है। दूसरे सोमवारको तो पत्रके बजाय मैं खुद ही बम्बईसे मन्दिरके लिए रवाना हो जाऊँगा।

इस शहरमें लोगोंने मुझे अपूर्व शान्ति दी है। बाहर भी दर्शनोंके लिए भीड़ खड़ी नहीं होती। अबतक तो मैं सोमवारको भी भीड़से नहीं बच सका हूँ। दो दरवाजोंपर खसकी टट्टी लगा दी गई है, इसलिए बाहर गरम हवा चलनेपर भी अन्दर ठंडक है। इतने प्रेमका अनुभव होनेपर भी मैं सफरकी तकलीफोंकी शिकायत करूँ, तो मेरे जैसा कृतघ्न कौन होगा?

कानोंमें पाँच-सात जगह, नाकमें तीन जगह, हाथकी हरएक अँगुलीमें और पैरकी हरएक अँगुलीमें बाली, अँगूठी व कंगन पहननेवाली बहनोंको कौन समझा सकता है कि इसमें कतई श्रृंगार नहीं है?

कुछ पढ़ी-लिखी बहनें भी यह सब पहने दिखाई देती हैं। जब-जब इस तरह सजी हुई बहनोंको देखता हूँ, तब-तब (अपने) मन्दिरकी बहनोंकी याद आती है। तुम लोग कितनी उपाधियोंसे छूट गई हो?

बापूके आशीर्वाद

गुजराती (जी॰ एन॰ ३६९९) की फोटो-नकलसे।