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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
और बेहोशीकी लम्बी अवधिमें उसकी सार-संभाल करते-करते स्वयं देवदास आसानीसे टूट गया होता। रसिककी मौत दिलमें दुःख नहीं बल्कि ईर्ष्या पैदा करती है।
[अंग्रेजीसे]
यंग इंडिया, २१-२-१९२९
यंग इंडिया, २१-२-१९२९
१३. चरखा-गीत
पुरुलिया कुष्ठाश्रमके रेवरेंड डोनाल्ड मिलरने 'वाच टावर' नामक पत्रिकाकी एक कतरन भेजी है, जिसमें रानीगंज कुष्ठाश्रमकी एक महिला रोगीके बारेमें रेवरेंड एफ॰ डब्ल्यू॰ रॉस द्वारा दिया गया विवरण छपा है। श्री रॉसके रोचक विवरणको, जिसमें सरोका चरखा-गीत भी शामिल है, आंशिक रूपमें नीचे दे रहा हूँ :[१]
- सरो हमारे अनेक चरित्रोंमें से एक है, वह सचमुचमें जानने योग्य महिला है। जब कोई माननीय दर्शक हमारे कुष्ठालयमें आता है तो उसका कार्य तब तक पूरा हुआ नहीं माना जाता जबतक सरो उसे यह आशीष नहीं दे लेती... 'प्रसन्न रहो, तुम्हारे धन और सन्तानमें वृद्धि हो, तुम इतने साल जियो जितने तुम्हारे सिरमें बाल हैं और तुम्हारा शरीर लोहे-जैसा मजबूत हो।' इस सूत्रको कहनेमें वह कभी थकती नहीं इसलिए यह किंचित् सौभाग्य की ही बात है कि अभीतक कोई बिलकुल गंजा आदमी यहाँ आशीष लेने नहीं आया है... जब बुनाईकी चर्चा की जाती है तो सरो खिल उठती है... जब उससे यह पूछा जाता है कि क्या वह जानती है कि चरखेका इस्तेमाल कैसे किया जाता है?... तब वह अपनी किशोरावस्थाका एक पुराना गीत गाने लगती है...
'चरखा मेरा पति है, पुत्र है और पौत्र है;
चरखेकी मददसे अब हम हाथी बाँध सकते हैं;
हम-म-म, हम-म-म चलता चरखा।'
इस लोकगीत और इसी तरहके और गीत जो मुझे गुजरात तथा भारतके दूसरे भागोंसे प्राप्त हुए हैं, उनमें जो साम्यता है, वह ध्यान देने योग्य है।
[अंग्रेजीसे]
यंग इंडिया, २१-२-१९२९
यंग इंडिया, २१-२-१९२९
- ↑ यहां केवल कुछ अंश ही दिये जा रहे हैं।