श्री रामेश्वरदासने अपने हिन्दी पत्रमें कुछ विचारणीय बातें भी लिखी हैं, जिनका भावार्थ नीचे देता हूँ :
- मैं यह दान ऊपर बताये अनुसार कर रहा हूँ, इसका यह भी एक कारण है कि हम लोगोंके यहाँ आजकल मृत व्यक्तिके नामपर गोदान किया जाता है। लेकिन मैं मानता हूँ कि इससे तनिक-सी भी गोसेवा नहीं होती। हमारे यहाँ अब गोचर——चारागाह——नाम-मात्रको रह गये हैं, अतएव ब्राह्मण-वर्ग अन्त तक गायोंका पालन नहीं कर सकता; फल यह होता है कि आखिर वे कसाइयोंके हाथ पड़ती हैं। अतएव आज गोदान शुद्ध गोसेवाके प्रचारमें है। इस प्रचारका एक रूप 'गोरक्षा कल्पतरु' जैसी पुस्तकोंका बड़े पैमानेपर प्रचार करना है। मुझे आशा है, हिन्दू समाज इस बात को समझेगा और यह पुस्तक मँगा कर पढ़ेगा, उसपर विचार करेगा और उसमें सूचित उपायोंपर अमल करेगा।
नवजीवन, २६-५-१९२९
३९४. पत्र : माधवजी वी॰ ठक्करको
२६ मई, १९२९
तुम्हारे तीन पत्र मुझे बम्बईमें मिले। मैं साबरमती दो दिन पहले पहुँच रहा हूँ।
तुम्हारा जीवन-वृत्तान्त मिल गया। मुझे इसकी जरूरत थी।
तुम्हारे गुस्सेका एक इलाज तो यह है कि तुम थोड़े समयके लिए मेरे साथ रहो। मैं यह चाहता भी हूँ। जुलाई, अगस्तमें मैं आश्रममें रहूँगा। इस बार तो १० जूनतक यहाँ रहूँगा।
बादाम तो खाँसी शुरू हो जानेका कारण नहीं हो सकता। सम्भव है इसका कारण मक्खन हो; सो उसे छोड़कर अच्छा किया है। बादाम भिगोकर छिलका उतार लो और उसे पीस कर दूध बना लो तो कोई हानि नहीं है।
डबल रोटी बनानेके लिए तुम्हारे पास भट्ठी है? थोड़ी तादादमें उन्हें बनाना कठिन है; इसे बनानेकी झंझटमें न पड़ो और फलाहार करो, मैं तो यही चाहता हूँ।
मोहनदासके वन्देमातरम्
गुजराती (जी॰ एन॰ ६७८४) की फोटो-नकलसे।