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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 40.pdf/४७

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१४. मेरी आसन्न बर्मा-यात्रा

पिछली बार बर्मा मैं सन् १९१५ में गया था, सो भी सिर्फ रंगून शहरमें। उसके बादसे अबतक समयकी कमीके कारण मैं उस महान प्रान्तमें नहीं जा सका हूँ, यद्यपि उधरसे मुझे बहुतसे निमन्त्रण आ चुके हैं। अगले महीनेकी शुरुआतमें ही मैं वहाँ जानेकी आशा रखता हूँ। मैं बर्मा मुख्यतः खादी और गुजरात विद्यापीठके कार्यके लिए जा रहा हूँ, क्योंकि इन दोनों कामोंमें बर्माके गुजरातियोंने हमेशा उदारतापूर्वक सहयोग दिया है। मैं तो लालाजी-स्मारकके लिए भी दान पानेकी आशा रखता हूँ। और यह सोचकर कि इस यात्रामें मैं अपने आजीवन मित्र और साथी डाक्टर प्राण-जीवन मेहतासे भी मिल सकूँगा, मुझे और हर्ष होता है। जो बर्मी मित्र मुझे पहले ही निमंत्रण भेज चुके हैं, वहाँ मुझे उनसे मिलकर परिचय बढ़ानेकी भी आशा है। लेकिन मैं अपने सब मित्रोंको सूचित किये देता हूँ कि मेरे पास समय बहुत थोड़ा है। मार्चके अन्तिम सप्ताहमें मुझे गुजरात लौट आना है जिससे मैं मार्चके अन्तमें मोरवीमें सरदार वल्लभभाई पटेलकी अध्यक्षतामें होनेवाली काठियावाड़ राजनीतिक परिषद्में भाग ले सकूँ। साथ ही मैं अपने मित्रोंसे यह भी कह देना चाहता हूँ कि अब मेरा शरीर ऐसा नहीं रह गया है, जो किसी समय बिना थके लगातार हर तरह की मेहनतमें लगा रहता था। इसी सिलसिलेमें मैं उन्हें यह भी याद दिला देता हूँ कि मुझे दो साप्ताहिक पत्रोंका सम्पादन करना पड़ता है और रोजाना पत्रोंका जवाब भी लिखना-लिखाना पड़ता है। अतः मैं स्वागत-समितिसे आशा रखता हूँ कि वह मुझे स्नान, भोजन, आराम, सम्पादन- कार्य और दूसरी लिखा-पढ़ीके लिए लगातार छः घंटोंका समय देगी। मैं सवेरे ४ बजे उठता हूँ, इसलिए आशा है स्वागत-समिति इसका खयाल रखेगी और रातमें ८ बजेके बाद मेरा कोई कार्यक्रम नहीं ठहरायेगी, जिससे मैं रातमें ९ बजे ही सो सकूँ।

[अंग्रेजीसे]
यंग इंडिया, २१-२-१९२९
 
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