उन्हें एक दूसरेसे अलग रखती है । विभिन्न और प्रायः परस्पर विरोधी कार्यक्रम तथा नीतियाँ उन्हें विभ्रान्त करती हैं। खादी एक ऐसा कार्यक्रम है जो उन्हें धीरे- धीरे ही सही किन्तु निश्चयपूर्वक एक-दूसरेसे बाँध रहा है तथा अनुशासनके नियन्त्रणमें ला रहा है। मेरे साथ यहाँ जो कार्यकर्त्ता साबरमती तट चले आये हैं उनके साथ मैं यहाँ जो बातचीत कर रहा हूँ उससे मैं बहुत-कुछ सुफलकी आशा करता हूँ ।
सभाओंके आयोजकोंको एक सलाह
मैं कार्यकर्त्ताओंका ध्यान इस दौरेके अपने एक आविष्कार -सचल मंच- की ओर खींचना चाहता हूँ । यह आविष्कार बुद्धिकी नहीं उस आवश्यकताकी देन है जो अधिकांश आविष्कारोंकी जननी है । मेरा शरीर कमजोर है और आदेशके अनुसार बार-बार उठना और बैठना उससे सहन नहीं होता । मोटर गाड़ीसे उतरना, फिर अपने प्रशंसकोंकी शोर कर रही भीड़को चीर कर आगे बढ़ना, और उसके बाद ऐसे मंचोंपर चढ़ना जिनके लक्षणोंसे लगता है ये जाने कब गिर जायेंगे और जो कभी- कभी गिर भी जाते हैं, फिर मंचसे उतरना और पुनः बढ़ी आ रही भीड़में से अपना रास्ता निकालना, बमुश्किल अपनी गाड़ीतक पहुँचना और उसमें चढ़कर अपनी जगह बैठना, और १५ मिनटके बाद फिर इसी क्रियाको दोहराना -- यह ऐसी कसरत है जिसे मेरा शरीर अब झेल नहीं सकता। इसलिए मैंने अपने प्रमुख जेलर श्री कोंडा वेंकटप्पैयाको यह सुझाया था कि जहाँ भी मुझे बोलना हो वहाँ मेरी गाड़ीको ही उस स्थानके केन्द्र तक पहुँचा दिया जाये, और मंचकी तरह उस गाड़ीका ही उपयोग कर लिया जाये। मैंने कहा कि मैं गाड़ीकी पीठके किनारेपर बैठ जाया करूँगा और वहींसे बैठे-बैठे भाषण दूंगा । वे तुरन्त सहमत हो गये । इस साधनसे समय, शक्ति, स्थान और पैसा हर चीजकी बचत हुई। इसमें न मंचकी आवश्यकता थी, न कुर्सियोंकी, और सजावटके नामपर श्रोताओंके सुन्दर हृदयोंके सिवा, अन्य किसी सजावटकी आवश्यकता भी न थी । यह व्यवस्था हर तरहसे सम्पूर्ण सिद्ध हुई, और मैं सभाओंके संगठकों को यह सलाह देता हूँ कि जहाँ बहुत सारी सभाओंमें भाषण देना हो, वहाँ पर वे मेरी इस ताकीदपर अमल करें ।
खादीधारी हज्जाम
ज्यादातर में अपनी दाढ़ी स्वयं बना लेता हूँ । लेकिन इस बार मैं एक मित्रके दिये हुए अपने सेफ्टी-सेटको तिलांजलि देकर पुनः एक बिहारी उस्तरेपर आ गया, जिसे मगनलाल गांधी छोड़ गये हैं । हमारा देशी उस्तरा, यदि उसे अच्छी तरह रखा जाये तो, एक बहुत ही बढ़िया साधन है । हमारे हज्जाम अपना उस्तरा पैनानेके लिए पत्थरकी जिस सिलका या चमड़के जिस पट्टेका उपयोग इतनी खूबीसे करते हैं, उनका उपयोग करनेकी कला में अभीतक हस्तगत नहीं कर पाया हूँ, इसलिए अपने इस दौरेके प्रारम्भिक दिनोंमें मैंने एक खादीधारी हज्जामको बुला भेजा । आन्ध्रमें खादीधारी हज्जामको ढूंढ़ लेना बहुत आसान बात है । बम्बईमें ऐसा कर सकना कठिन है । मैंने उसे अपना यह उस्तरा दिया, और उसने मेरी दाढ़ी बहुत मजेसे