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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 40.pdf/५०

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१७. पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको

सत्याग्रह आश्रम
साबरमती
२१ फरवरी, १९२९

प्रिय सतीश बाबू,

आपके पत्र मिले। आपके तथा हेमप्रभा देवीके स्वास्थ्यके बारेमें जो विवरण मिला है वह तो बुरा है। बिना दिये कभी कुछ न लेनेके विचारको सदा मनमें जमाये रखनेकी बात मुझे पसन्द नहीं। स्वार्थमय दृष्टिकोणके एक बार समाप्त हो जानेपर बिना दिये कुछ न लेनेका सवाल तो फिर उठता ही नहीं; यह सब तो बिना सोचे सहज ही होता रहता है। यदि मुझे हमेशा स्वयं अपने आगे यही साबित करने की जरूरत महसूस होती रहे कि मैंने आपसे एक तोला चावल लेकर आपको बदलेमें दो तोला दाल दी है, तो ऐसी हालतमें मैंने दिया तो कुछ नहीं लिया-भर ही है। क्योंकि इस बातका अहसास कि आपने मुझे जितना दिया, मैंने आपको उससे अधिक दिया है, मेरे उपहारका मूल्य नष्ट कर देता है। हेमप्रभा देवीके लिए यह सुखकी बात क्यों नहीं हो सकती कि वह अभय आश्रममें रहकर बदलेमें कुछ दिये बिना प्रकट रूपसे सारी सेवाएँ प्राप्त करती रहें। क्या आप हर छोटी-छोटी बातमें इसी तरह व्यवहार करते हैं और हर लेन-देनको तराजूपर रखकर देखते हैं? किन्तु कहीं संतुलन न बिगड़ जाये? और अगर आप ऐसा नहीं सोचते तो इस मामलेमें लेन-देनका विचार ही मनमें क्यों लाते हैं, खास तौरसे जब यह पति और पत्नीके बीचकी नहीं बल्कि दो भिन्न संस्थाओंके बीचकी बात है, ऐसी संस्थाओंकी जो एक-दूसरेसे खिंची भी रहती हैं। पता नहीं मैं अपना आशय स्पष्ट कर भी सका हूँ या नहीं। अवश्य, यह दलील मैं यह मानकर दे रहा हूँ कि अभय आश्रम हेमप्रभादेवीको अपने यहाँ रखनेको खुशीसे तैयार है।

आपके खूराक-सम्बन्धी प्रयोगसे मैं प्रसन्न हूँ। इसमें किया गया परिवर्तन अच्छा है। और जब आप प्रयोग कर ही रहे हैं तो विभिन्न प्रकारके तेलोंके गुणोंकी ठीक जानकारी अब आप मुझसे ज्यादा ठीक कर सकते हैं। जहाँतक मेरा अपना अन्दाज है अलसीका तेल सबको मात करता है। लेकिन यह क्या चीज है जो उसे विकार रहित बनाती है, यह मैं नहीं जानता। और अगर आप अपने तेल सम्बन्धी प्रयोगको वैज्ञानिक ढंगपर चलाना चाहते हैं तो खुदका निकाला हुआ तेल ही प्रयोगमें लायें, क्योंकि बाजारमें आप शुद्ध तेल कभी नहीं पा सकते। और पता नहीं किस कारणसे कोई भी तेल ज्यादा समयतक अच्छा नहीं रह पाता।

आप 'उपवास-उपचार'[] पर 'यंग इंडिया' में प्रकाशित सामग्रीको सावधानीसे अवश्य पढ़ें। लेखक एक विद्वान व्यक्ति हैं और वह बहुत ही कायदेसे काम करनेवाले

  1. इस सम्बन्धमें गांधीजीके विचारोंके लिए देखिए "विलक्षण उपवास-उपचार", २८-२-१९२९।