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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 40.pdf/५२

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

मेरा कार्यक्रम यह है। मार्चकी पहली तारीखको मैं यहाँसे चल दूँगा, नहीं तो दो तारीखको तो निश्चित ही। फिर ३ अथवा ४ को सुबह कलकत्ता पहुँचूँगा। जो गाड़ी मैं पकड़ूँगा उसीके अनुसार समयमें कुछ फेर-बदल होगा। दिल्ली होकर आनेकी मेरी इच्छा है। ऐसा करनेसे ८ रुपये प्रति यात्रीकी बचत होती है और थोड़ा समय भी बचता है। मैं रेलवेकी समयसारिणी देखूँगा। मैं मंगलवार ५ मार्चकी सुबह कलकत्तासे रंगूनके लिए चल दूँगा। मार्चके अन्तिम सप्ताहमें मैं रंगूनसे साबरमतीके लिए रवाना होऊँगा ताकि २७ मार्चतक वहाँ जरूर पहुँच जाऊँ।

रामविनोदके बारेमें लिया गया निर्णय मेरे लिए बहुत चिन्ताका कारण बन रहा है। राजेन्द्र बाबूको इससे बहुत गहरी चोट लगी है।[] वे और उनके साथी कार्यकर्त्ता इस निर्णयको अपने ऊपर लांछन मानते हैं। उन्होंने अपने साथियोंसहित अपना त्याग-पत्र दे दिया है। मैंने इस बातको हँसीमें टाल दिया है, राजेन्द्रबाबूको सान्त्वना दी है और उनसे कहा है कि आखिरकार इसका अन्तिम निर्णायक तो मैं हूँ और इसलिए मुझे प्रसन्नतापूर्वक प्रमाणोंके हर अंशको देखना चाहिए और प्रमाणोंको सामने रखकर किये गये आपके निर्णयपर गौर करनेके बाद मुझे अपना निर्णय सुनाना चाहिए। आगेकी प्रगतिके बारेमें मैं आपको सूचित करूँगा। अभी आपको इस बारेमें परेशान होनेकी जरूरत नहीं है। जरूरत पड़नेपर मैं आपसे मददके लिए कहूँगा। आशा है इस कठिनाईपर मैं विजय प्राप्त कर सकूँगा। लेकिन इस समय मेरे ऊपर काफी बोझ पहले ही है और इस कामसे वह बोझ और बढ़ेगा। लेकिन यह तो अनिवार्य है।

इस विषयमें दूसरी चीज जो मैं सिन्ध जानेसे और भूलनेसे पहले लिखना चाहता था वह अखिल भारतीय चरखा संघकी समितिके जमानत विषयक प्रस्तावके सम्बन्धमें श्री निरंजन बाबूके पत्रके बारेमें है। प्रस्ताव उतना आलोचनीय नहीं है जितना निरंजनबाबूका खयाल है। यह काफी लोचदार है और मेरी समझसे यह आवश्यक है। जैसे-जैसे हमारा संगठन बढ़ता जायेगा जमानतकी माँग करनी ही होगी। और कोई व्यक्ति राष्ट्रभक्त अथवा राष्ट्रसेवी है, केवल इस आधारपर जमानत देनेके नियमसे मुक्त नहीं हो। जिनके बारेमें कोई शंका नहीं है और जो अपनी ईमानदारीको साबित कर चुके हैं और जमानत दे नहीं सकते उनको जमानत देनेसे मुक्त कर दिया जायेगा, और करना भी चाहिए। क्या आप इस प्रस्तावसे सहमत नहीं हैं?

हृदयसे आपका,
बापू

अंग्रेजी (जी॰ एन॰ १६०३) की फोटो-नकलसे।

  1. बिहारके एक खादी कार्यकर्त्ता रामविनोद सिन्हाको उनकी परियोजनाओंमें सहायता देनेके लिए २५,००० रुपयेका ऋण दिया गया था। बादमें उनपर आरोप लगाया गया कि सार्वजनिक धनसे जिस संस्थाकी स्थापना उन्होंने की है उसे वह अपनी निजी मिल्कियत मानते हैं। इस आरोपकी जाँचके लिए सतीशचन्द्र दासगुप्तको गांधीजीने नियुक्त किया। श्री दासगुप्तने निर्णय दिया कि चरखा संघकी बिहार शाखाका प्रबन्ध बहुत गड़बड़ है। डा॰ राजेन्द्र प्रसादने, जो इसके प्रधान थे, इसका विरोध किया और गांधीजीसे प्रार्थना की कि वे खुद इसकी जाँच-पड़ताल करें। कुछ समय बाद इस मामलेको गांधीजीने नारणदास गांधीके सुपुर्द किया और उन्होंने बिहार चरखा संघ द्वारा प्रस्तुत किये गये हिसाबको स्वीकार कर लिया।