२३. दिल्लीमें क्या हुआ?
सिन्धसे मैं दिल्ली गया और वहाँ तीन दिन रहा। वाइसराय महोदयसे भी मिला था। इसलिए वहाँ क्या हुआ यह जाननेकी जिज्ञासा लोगोंमें होना स्वाभाविक ही है। यदि हम सच्चे अर्थोंमें स्वावलम्बी बन गये होते तो हमें यह जाननेकी उत्सुकता न होती। वाइसरायसे मिले तो क्या और न मिले तो क्या? किन्तु एक राष्ट्रके रूपमें हम अभी ऐसी उदासीनता विकसित नहीं कर पाये हैं। अभीतक अंग्रेजी राज्यका प्रभाव हमारी दृष्टिमें चकाचौंध पैदा कर पाता है और जबतक यह हाल है तबतक वाइसरायके कार्य, उनके वचन और उनसे मिलनेवालोंने क्या देखा और क्या सुना इत्यादि जाननेकी हमारी इच्छा बनी रहेगी; और इसलिए इस जिज्ञासाको कुछ हदतक तृप्त करना भी उचित है।
दिल्ली जाते समय मुझे श्री विट्ठलभाईकी योजनाका कोई अन्दाज़तक नहीं था। विदेशी कपड़ेके बहिष्कारके कार्यके सम्बन्धमें मोतीलालजीने मुझे दिल्ली बुलाया था और कांग्रेसकी कार्यकारिणी समितिकी बैठक मुलतवी की गई थी। कुछ असुविधा होनेपर भी दिल्लीको १७ से १९ तारीखतक समय देनेका मैंने मोतीलालजीको तार किया था और उसी कारण मैं वहाँ गया। दिल्ली पहुँचनेपर श्री विट्ठलभाईकी योजनाका पता चला।
विधानसभामें जाकर कोई भारतीय जितनी कुछ देश-सेवा कर सकता है, उतनी सेवा श्री विट्ठलभाई बहुत होशियारीसे कर रहे हैं। वे अपने निर्भय व्यवहारसे देशकी और अपने पदकी शोभा बढ़ा रहे हैं। अपनी स्वतन्त्रता, निर्भयता और देश-प्रेम प्रकट करनेका एक भी मौका वे जाने नहीं देते। और ऐसा करनेपर भी वे अपने स्थानके योग्य मर्यादा और तटस्थताका पालन करते हैं। वे यों मानते हैं कि वे कुछ भी कर सकते हों फिर भी यदि भिन्न-भिन्न मतके नेताओंको यदि एक-दूसरेसे मिला सकें तो वही बहुत है, और उन नेताओंको वाइसरायसे मिला सकें तो और भी अच्छा। इसलिए उन्होंने मेरे दिल्ली जानेके अवसरपर वाइसराय और दूसरे नेताओंको चाय पीनेका निमन्त्रण भेजा। उसमें उनका मेहमान होनेके कारण सामान्यतः मुझे हाजिर तो होना ही चाहिए था। ब्राह्मणका काम विवाह करा देना है, किसीका घर चला देना नहीं। विट्ठलभाईने भिन्न-भिन्न मतके नेताओंको एकत्र तो कर दिया किन्तु इस तरह एकत्र होनेवाले चाय पीने और गप्प लड़ानेके अलावा और कर ही क्या सकते थे। किन्तु विट्ठलभाई तो बहुत-कुछ करना चाहते थे, और उन्होंने हँसी-हँसीमें बहुत-सी बातें छोड़ करके लोगोंके मनकी बात निकालनेका प्रयत्न भी किया। परन्तु ऐसे प्रयत्नकी मर्यादा होती है। इसलिए मेरे विचारसे यह कहा जा सकता है कि जिस विषयके सम्बन्धमें वे बातचीत कराना चाहते थे वह न हो सकी। इस चायकी मजलिसके कारण मियाँ और महादेव एक दूसरेसे मिले और यदि अंग्रेजी उक्तिका[१] शब्दार्थ
- ↑ ब्रेक आइस—किसी गतिरोधको समाप्त करनेकी कोशिश करना।