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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 40.pdf/५८

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

करें तो उन्होंने बर्फ तोड़ी, राजपूतोंकी भाषामें कहें तो कसुंबा[] पिया और लौकिक भाषामें कहें तो कह सकते हैं कि पारस्परिक झिझक टूटी। पाठक यह समझ लें कि इससे अधिक और कुछ नहीं हो सका। यदि कोई यह कहे भी कि कुछ हुआ है तो जो समझदार हैं वे यहीं समझेंगे कि ऐसा कहना केवल भोलापन है, वस्तुतः ऐसा कुछ भी नहीं हुआ होगा। वास्तवमें हमारा उद्धार हमारे अपने ही हाथों होगा। जब हममें शक्तिका संचार होगा और उसका हमें भान होगा, तभी कोई ऐसा मिलाप फलदायी हो सकेगा। आज तो हममें आत्मविश्वास नहीं है। अभी हमने कुछ भी करके नहीं दिखाया है; और जबतक हम लोगोंमें आत्मविश्वास नहीं होगा, अर्थात् जबतक हमने कुछ भी करके नहीं दिखाया है तबतक हम भले ही ऐसी मुलाकातें करें या उनके लिए प्रयत्न करते रहें, हमें उनसे अपने मनोवांछित फलकी प्राप्ति न होगी। उसकी आशा भी नहीं रखनी चाहिए। इसलिए दिल्लीकी उस मजलिसका मेरा निदान तो यहीं है कि लोग उसे भूल जायें और स्वराज्यका थोड़ा-बहुत कुछ काम करनेमें लग जायें।

इस दृष्टिसे विचार करनेपर तो मैं यह चाहता हूँ कि उस चायकी मजलिसमें क्या हुआ यह जाननेकी इच्छा करनेके बदले पाठक मुझसे कार्यकारिणी समितिमें क्या हुआ यह जाननेकी इच्छा रखें और समाचारपत्रोंमें प्रकाशित प्रस्तावसे सन्तोष न मानें। अब मैं इस विषयपर आता हूँ।

कार्यकारिणी समितिमें मुख्य रूपसे चर्चा विदेशी कपड़ेके बहिष्कारके सम्बन्धमें हुई, क्योंकि उसीके लिए मुझे वहाँ बुलाया गया था। सिन्धके सम्बन्धमें लिखे मेरे लेखमें[] कोटड़ीके जिस अनुभवका मैंने उल्लेख किया है उसका मैंने समितिके सामने वर्णन किया, और यह सूचित किया कि यदि कार्यकारिणी समितिके सदस्य यह मानते हों कि खादीकी शर्त निकाल दी जाये तो कांग्रेस अधिवेशनके पहले ही उसे यह शर्त निकाल देनेका जोखिम स्वीकार करना चाहिए। यह जोखिम लेनेको कोई तैयार नहीं था। सबने यह महसूस किया कि जब बहिष्कारकी बात चल रही हो तब खादीकी शर्तको निकाल देनेकी बात चलाई ही नहीं जा सकती। सबने यह भी महसूस किया कि विदेशी कपड़ेका बहिष्कार ही आज हमारे पास सबसे उत्तम शस्त्र हैं। जो योजना मैं प्रकाशित कर चुका हूँ वह सर्वानुमतिसे पास की गई। उसके लिए एक विशेष समिति चुनी गई और समितिको अन्य सदस्य चुननेका भी अधिकार दिया गया। मुझे उसका अध्यक्ष बनाया गया है। मैंने नम्रतापूर्वक इस पदको स्वीकार किया है परन्तु इस स्थानके योग्य सामर्थ्य और आत्मविश्वास आज मुझमें नहीं है यह मुझे स्वीकार कर लेना चाहिए। 'आत्मविश्वास नहीं है' इसका यह अर्थ नहीं कि बहिष्कार के सम्बन्धमें मेरे मनमें उत्साहकी थोड़ी भी कमी हुई है। परन्तु मैं यह नहीं जानता कि इस दिशामें लोगोंसे कहाँतक काम लिया जा सकेगा। फिर भी जिस पदको

 
  1. अफ़ीमसे निर्मित एक पेथ, जिसे बैठकर पीना मित्रताका लक्षण माना जाता है।
  2. देखिए "सिन्धके संस्मरण", २१-२-१९२९।