इतनेपर भी सिर्फ स्वार्थ और मोहके कारण हमें स्नेहीकी मृत्युसे दुःख होता है। बहुत वर्ष पहलेसे मैं इस बातकी कोशिश कर रहा हूँ कि मैं ऐसे मोहसे मुक्त हो जाऊँ और फलस्वरूप रसिकके देहावसानके समाचारसे मुझे दुःख नहीं हुआ। जो हुआ सो तो केवल स्वार्थवश।
रसिककी उम्र १७ वर्ष थी। बचपनसे ही वह मेरी देखरेखमें था और दूसरे बालकोंकी तरह उसे भी धर्ममय देश-सेवाकी तालीम दी जाती थी। रसिक चंचल, शरारती और तेजस्वी बालक था। उसके शरीरका गठन सुन्दर था। वह साहसी था। जोखिम-भरे कामोंमें वह हमेशा आगे रहता था। पिछले एक सालसे उसकी शरारत कम हो गई थी और वह शक्तिका रूप धारण कर रही थी। वह 'गीता'का अभ्यासी था, कताई-पिंजाईमें कुशल था। एक दो बार उसने लगातार २४ घंटोंतक पीजनेका व्रत लिया था और उसमें वह सफल भी हुआ था।
मेरा सबसे छोटा पुत्र देवदास दिल्लीकी जामिया मिलियामें काम कर रहा है। वहाँ वह विद्यार्थियोंको कताई और हिन्दी सिखा रहा है। लगभग चार महीने पहले बढ़ईगिरी और पिंजाई कामके लिए उसने मेरे एक दूसरे पौत्र नवीनको और रसिकको दिल्ली बुला लिया था। दोनों दिल्ली जाकर सुन्दर सेवा कर रहे थे। इससे पहले तीव्र इच्छा होनेके कारण रसिक सेवा करनेके लिए बारडोली गया। वह जहाँ जाता लोकप्रिय बन ही जाता था। ऐसे सेवकको प्रकृतिने उठा लिया; इस स्वार्थजनित दुःखने मुझे दुःखी जरूर कर दिया। लेकिन मैंने मनमें सोचा कि प्रकृति हमेशा न्याय करती है; वह दयालु है इस कारण रसिकसे भी वह अधिक काम करा लेगी। बस इसी अटल श्रद्धाके बलपर मैं शान्तिका अनुभव कर रहा हूँ।
दिल्ली जानेपर रसिकमें भक्तिका उदय हुआ। कांग्रेस अधिवेशनसे लौटते समय मैं दिल्ली होता हुआ आश्रम आया था। दिल्लीमें रसिकने मुझे कहा था कि उसे १७ वाँ वर्ष शुरू हुआ है। इस सिलसिलेमें दूसरे बालकोंकी भाँति उसने भी कुछ व्रत लिये हैं। उसने तीन व्रत लिये थे : एक बारमें केवल तीन तरहकी वस्तु खाना, २४ घंटोंमें सिर्फ तीन बार खाना, और दो वर्षोंमें अर्थसहित 'रामायण'का अध्ययन कर लेना। उसके चंचल स्वभावका खयाल करके मैंने उसे सचेत किया। लेकिन उसने कहा, "अब मुझे ऐसे व्रत कठिन नहीं मालूम होते। 'रामायण' मुझे प्रिय है।" मैं खुश हुआ।
इस व्रतके सिलसिलेमें १८ जनवरीके दिन रसिकने नीचे लिखा पत्र मुझे भेजा था। ८ फरवरीको तो वह चल ही बसा।
- आपका पत्र मिला। मुझे कुछ दिनसे बुखार आ रहा है; रोज तो नहीं लेकिन किसी-किसी दिन आ जाता है। अच्छा हो जायेगा। व्रत चालू है। मेरे 'रामायण' सीखनेका प्रबन्ध करके जाइए। क्योंकि अगर आप बाहर प्रवासमें हों और मैं आश्रममें पहुँचूँ तो मुझे कौन सिखायेगा और उसकी सुविधा कैसी होगी? मुझे भोजन-सम्बन्धी व्रत तो बड़े सहल मालूम पड़ते हैं। इस