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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 40.pdf/६२

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय
समय तो मेरा वजन बहुत घटा हुआ होगा; क्योंकि मेरी तबीयत ठीक नहीं रहती। नवीनका वजन तो बढ़ा ही होगा।
आजकल यहाँ कताईका काम खूब चल रहा है। पिंजाई भी होती है। अब एक दो हफ्तोंमें एक दूसरा थान उतरेगा और महीने भर बाद तीसरा। अब तो जल्दी-जल्दी तैयार होने लगेंगे। मार्चके मध्यमें अथवा अन्तमें वहाँ आयेंगे।

रसिककी जो सेवा की गई वह शायद ही किसी व्यक्तिको प्राप्त हुई हो। वह देवदासका प्रिय भतीजा और शिष्य था। उसने तो रसिककी अनुपम सेवा की और डा॰ अन्सारीने उसकी वैद्यकी तरह नहीं बल्कि पिताकी तरह देखभाल की। डा॰ शर्मा उसकी सेवामें खड़े ही रहे। डाक्टरोंने उसके लिए दो सेविकाओंका प्रबन्ध कर रखा था। जामियाके मुसलमान भाइयोंने उसकी सेवामें कोई कसर नहीं रखी। जिन हिन्दू भाइयोंको उसकी बीमारीका समाचार मिला उन्होंने दिन-रात एक कर दिया। इन सबका मैं ऋणी हूँ। रसिक इतनी छोटी उम्रमें सेवाधर्मको पहचान ले, उसमें परायण रहे, उत्साहसे 'गीता' पाठ करे, कठिन व्रत स्वीकार करे, उन्हें सरल माने, दो वर्षमें 'रामायण'का अभ्यास समाप्त करनेकी इच्छा रखे और ऐसी शुभ भावनाओंका संग्रह करता हुआ अनन्य सेवा पाकर मृत्युसे मिले, ऐसी मृत्यु पानेवालेसे सभी ईर्ष्या ही करेंगे। और ऐसे पौत्रके बारेमें मुझ-जैसा दादा शोक करे सो तो स्वार्थ और मोहवश ही कहलायेगा।

[गुजरातीसे]
नवजीवन२४-२-१९२९
 

२५. पत्र : जयरामदास दौलतरामको

आश्रम
साबरमती
२४ फरवरी, १९२९

प्रिय जयरामदास,

तुम्हारा पत्र मिला और तार भी। चायपार्टीका कोई ठोस परिणाम निकलनेकी तो सम्भावना थी नहीं। लेकिन इसके बारेमें मेरा विवरण[] तुम आजके 'नवजीवन'में देखोगे। इसे किसीसे पढ़वा लेना।

लेखा-परीक्षक और निरीक्षकको निःसन्देह सिन्ध भी जाना होगा।

सिन्धके मामलेमें मैंने मोतीलालजीसे बातचीत की तो थी। उन्हें इस बातकी खुशी हुई कि मैंने मामलेको समझ लिया है और वे इससे भी सहमत हैं कि जहाँ कहीं भी इसमें अनियमितता हो, उसे दूर कर देना चाहिए। मेरा खयाल है कि 'यंग इंडिया'में मेरी टिप्पणीसे यह मामला साफ हो गया है।[]

  1. देखिए "दिल्लीमें क्या हुआ?", २४-२-१९२९।
  2. देखिए "सिन्धके संस्मरण", २१-२-१९२९ का उपशीर्षक "कांग्रेसके झगड़े"