जब हमें यह लगेगा कि हमने अपनी कमजोरियोंपर विजय पा ली है तो हमारा इरादा है कि हम वास्तविक नामको फिर अपना लेंगे।[१]
नौजवानोंसे सम्बन्धित आपके प्रवचन भी इतने ही रोचक हैं।
हृदयसे आपका,
दीवान भवन
दिल्ली
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १५३४६) की माइक्रोफिल्मसे।
२७. पत्र : जसवन्तरायको
आश्रम
साबरमती
२४ फरवरी १९२९
आपका १३ तारीखका पत्र मिला। मीरपुरखासकी मेरी यात्राके दौरान आचार्य गिडवानी मुझसे मिले थे और अन्त्यज लड़कों तथा खादीके बारेमें मुझसे बातें की थीं। उन्होंने मुझसे कहा था कि मुझे आपका एक पत्र मिलना चाहिए। यह पत्र मुझे, जब मैं दिल्लीसे साबरमती वापस आया, तब मिला। मैं नहीं सोचता कि आपके और आचार्य गिडवानीके मामलेमें मेरा हस्तक्षेप करना जरूरी है। निश्चय ही आप वही करेंगे जो उचित है। यदि श्रीयुत मणिलाल कोठारी यहाँ होते तो मैं आपका पत्र उन्हें दिखला देता। इस समय तो वह बढवानमें अपने बीमार पिताकी सेवामें लगे हुए हैं।
हृदयसे आपका,
जसवन्तराय एंड सन्स
कमीशन एजेंट्स
कराची
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३३६७) की माइक्रोफिल्मसे।
- ↑ १८ फरवरीके अपने पत्रमें गिरधारीलालने लिखा था : "मैं व्यक्ति पूजाके तथा संस्थाओंको धर्म-स्थान बनानेके बिलकुल विरुद्ध हूँ। व्यक्तिगत श्रद्धा, आदर और स्नेह अलग-अलग चीजें हैं। इस देशमें हम महन्तवाद बहुत देख चुके हैं। अब समय है कि हम इस नीतिके पुनः प्रचलनका विरोध करें। देश भरमें जो तमाम धार्मिक मठ हैं वे ही काफी बुरे हैं। अब राजनीतिक मठोंकी स्थापना करके हम उस बुराईको बढ़ाना नहीं चाहते। किसी भी वस्तुमें धार्मिक पवित्रता आरोपित करनेके अवास्तविक रवैयेके विरुद्ध नौजवान लोग विद्रोह करेगें। इस कारण 'सत्याग्रह आश्रम' का नाम बदल कर 'उद्योग मन्दिर' करनेका मुझे दुःख है।"