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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 40.pdf/७३

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पत्र : डी॰ जी॰ आम्बेकरको

किस प्रकारकी सहायता पहुँचाई गई और किसको पहुँचाई गई। आप गाँवोंमें जाकर ब्योरा एकत्र करनेवाले स्वयंसेवकोंसे भी बात कर रहे हैं। अपने कुछ प्रभावशाली अनुभव भी उन्हें बताने चाहिए। उन लोगोंके घरोंकी दशा भी बताई जानी चाहिए। सैकड़ों बातें हैं जो मेरी समझसे की जा सकती हैं। यदि इसी प्रकारके प्रभावशाली आँकड़े प्रति सप्ताह, बल्कि रोज-ब-रोज, लोगोंके सामने पेश [नहीं] किये गये, उस हालतमें आप यह कैसे आशा कर सकते हैं कि वे अपीलपर ध्यान देंगे? आप कह सकते हैं कि अगर आप ऐसे विवरण भेजेंगे तो वे छपेंगे नहीं।

मेरी टिप्पणीसे आप देखेंगे कि किसी-न-किसी प्रकार मैंने आपके तारका समर्थन ही किया है। आपसे मेरी जो शिकायत है वह यह कि आपका तार कोई बहुत आवश्यक नहीं था। तारमें जिन तथ्योंका उल्लेख किया गया है वे आपकी जानकारीमें कोई अचानक नहीं आये हैं। भू-स्खलन हो जाये या बाढ़ भयंकर रूप धारण कर ले तो आप तार दे सकते हैं, लेकिन अकालग्रस्त क्षेत्रकी रोजमर्राकी सामान्य घटनाओंके सम्बन्धमें आप तबतक तार नहीं दे सकते जबतक आप किसी दूरस्थ-समाचारपत्रको दिन-प्रतिदिन खबर न भेजते हों। कृपया अब जागिए। मैं किसी-न-किसी तरह ५,००० रुपयेका इन्तजाम कर लूँगा। लेकिन उससे फायदा क्या है? वह आपकी अपीलके जवाबमें नहीं होगा, बल्कि वह तो केवल एक मित्रकी ओरसे दूसरे मित्रको भेंट होगी और यदि मैं ठीक समझा हूँ तो आप इस ढंगसे सहायता नहीं चाहते हैं। यदि आप ऐसा चाहते तो आप केवल यह तार दे सकते थे : मेरी क्षुधापीड़ित जनताके लिए ५,००० रुपये अवश्य भेजिए। अक्लमन्दको इशारा काफी।

श्रीयुत च॰ राजगोपालाचारी
गांधी आश्रम
तिरूचेनगोडू

अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १५३५५) की फोटो-नकलसे।

 

४०. पत्र : डी॰ जी॰ आम्बेकरको

सत्याग्रह आश्रम
साबरमती
२७ फरवरी, १९२९

प्रिय मित्र,

आपका पत्र मिला। आपका पिछला पत्र भी मिल गया था। लेकिन सिन्धके दौरे और कामके भारी बोझके कारण पत्रका जबाब न दे सका।

मैं यह माननेके लिए तैयार नहीं हूँ कि श्रीयुत अवारीको खादीका प्रयोग करने से इसलिए रोका गया क्योंकि वे खादी पहनना चाहते हैं। यदि इस संदर्भमें आपके