४५. दिल्ली-यात्रा
मैंने स्पीकर द्वारा दी गई पार्टीकी[१] चर्चा अन्यत्र की है, किन्तु मैं चाहूँगा कि जिस कार्यसे मुझे दिल्ली जाना पड़ा उसे पाठकगण पूरी गंभीरता के साथ समझ लें और उसपर विचार करें। कार्यसमिति चाहती थी कि विदेशी कपड़ेके बहिष्कार-सम्बन्धी मेरी योजनाको स्वीकार करनेसे पहले वह उसे मुझसे समझ ले। कार्यसमितिका इस विषय में काफी आग्रह था। अतः मुझे सिन्धके बाद अपने कार्यक्रमको बीच में अधूरा छोड़कर पण्डित मोतीलालजीके बुलानेपर दिल्ली जाना पड़ा। कार्यसमितिने योजनापर बड़े विस्तारसे विचार किया और अन्तमें बिना किसी बड़े परिवर्तनके उसे स्वीकार कर लिया। इस योजनाको कार्यान्वित करनेके लिए एक विशेष समिति बनाई गई है। मैंने काफी हिचकिचाहटके बाद इस समिति के अध्यक्ष-पदका भार उठाना स्वीकार कर लिया है। मेरी हिचककी वजह यह थी कि मुझे लगता था कि वे लोग इसमें सहयोग नहीं करेंगे जो, यदि वे चाहें तो, बहिष्कारको सफल बना सकते हैं; और शायद उन्हें खादीमें विश्वास भी नहीं है। लेकिन मैंने यह भी देखा कि केवल इस एक खयालकी वजहसे, जिसका कि मुमकिन है कोई आधार ही न हो, मेरा इस उत्तरदायित्वको उठानेसे इनकार करना ठीक नहीं होगा। मेरा कर्त्तव्य तो प्रयत्न-भर करना है।
अब यह योजना देशके सामने है। समिति इस बातकी कोशिश करेगी कि वह यथासम्भव हर व्यक्तिको इसके बारेमें बताये और समझाये। लेकिन यहाँ भी हम इतना तो कह ही सकते हैं कि यह योजना इतनी सरल है कि हर स्त्री-पुरुष इसे अपनी हदतक कार्यान्वित कर सकता है। जिस स्त्री या पुरुषके पास कोई विदेशी कपड़ा हो, वह उसे त्याग दे और उसकी जगह प्रामाणिक खादी उपयोग में लाये। 'प्रामाणिक' शब्दपर जितना भी जोर दिया जाये, कम ही होगा। अत: योजनामें यह व्यवस्था है कि जो खादी अखिल भारतीय चरखा संघ द्वारा प्रमाणित न हो उसे प्रामाणिक न माना जाये। यह बहुत सरल बात है और सिर्फ इतना ही करना है कि खादीको अखिल भारतीय चरखा संघ द्वारा प्रमाणित भण्डारों या विश्वसनीय व्यक्तियोंसे ही खरीदा जाये। कोई स्त्री या पुरुष अपने वैयक्तिक प्रयासका महत्त्व कम न समझे। पूर्ण बहिष्कार वैयक्तिक प्रयासोंका योग ही तो है। हर एक गज विदेशी कपड़ेका त्याग बहिष्कारको निकट लाता है, हर एक गज खादीकी खरीद कुछ बहनों को राहत पहुँचाती है। जिस प्रकार लगातार बूँदें गिरनेसे पत्थर भी घिसता जाता है उसी प्रकार विदेशी कपड़ेका बराबर और लगातार बहिष्कार भारतका धन विदेशों में जानेके सबसे बड़े साधनको बन्द कर देगा और इस प्रकारके बहिष्कारके सभी अवश्यम्भावी फलितार्थं सामने आयेंगे। इसलिए हाथपर हाथ घर
- ↑ देखिए "टिप्पणियाँ", २८-२-१९२९ का उपशीर्षक "स्पीकर महोदयकी पार्टी"।