स्वाधीनताकी लड़ाई शुरू होगी। ऐसा मालूम होता है मानो प्रभुने उसमें भाग लेनेकी गरजसे ही मुझे जीवित रहने दिया है। इस युद्धका नायक तो ईश्वर आप ही को बनायेगा, में तो यह भी मान रहा हूँ कि आप अभीसे इस युद्धकी तैयारी करने लगे हैं। मैं जानता हूँ कि मेरे जीवनका मूल्य कुछ-नहीं के बराबर है। चाहे जो हो, मुझे इस युद्धमें अपना हिस्सा देना है। रूप और जापानकी लड़ाईमें एक जापानी सरदारको एक खाई पार करनेका मौका आया। उसने अपने सिपाहियोंसे कहा कि वे उस खाईमें कूद कर उसे अपने शरीरोंसे पाट दें और फौजके जानके लिए रास्ता तैयार कर दें। मैं जानता हूँ कि आपको भी ऐसी बे-पुलकी खाइयाँ लाँघनी पड़ेंगी। इस तरह की खाइयों को पूरनेवाले स्वयंसेवकोंकी नामावलिमें मेरा नाम जरूर लिख लीजिएगा। अगर मैं इतनी-सी सेवा भी कर सका तो इसे प्रभुकी कृपा समझूँगा।[१]
जिस युद्धकी बात हरदयाल बाबू करते हैं वह दिसम्बरकी आधी रातको शुरू होगा या नहीं सो तो दैव जाने। और युद्ध छिड़नेपर उसकी सरदारी मेरे हिस्से आयेगी या क्या होगा सो भी वही जाने। इसके सिवा हरदयाल बाबूके कथनानुसार कांग्रेसकी माँगें अस्वीकार ही होंगी, किन्तु इस बारे में मैं तो अभी इस निर्णयपर नहीं पहुँचा हूँ। हरदयाल बाबू आशावादी हैं। मेरा आशावाद शायद उनसे कुछ बढ़कर हो। मृत्युसे प्रेमपूर्वक मिलनेके लिए तैयार रहते हुए भी जबतक मृत्यु न आये तबतक अमरवत् जिन्दा रहनेके धर्ममें मेरा विश्वास है। उसी तरह अगर हमारी उचित माँगें स्वीकार न की जायें तो युद्धके लिए तैयार रहते हुए भी माँगोंके मंजूर हो जानेकी आशा रखनेके धर्मको मैं मानता हूँ; और सो भी अवधिके भीतर। कई बातें ऐसी होती हैं जो मनुष्य की दृष्टिसे या उसके लिए नामुमकिन होती हैं या नामुमकिन-सी लगती हैं। लेकिन ईश्वरकी दृष्टिसे और ईश्वरके लिए तो कुछ भी नामुमकिन नहीं है। हम देखते हैं कि जिस बात को हम सपने में भी नहीं सोचते वहीं रात-दिन होती रहती है। अतः सिर्फ हमारी माँग के बारेमें ही कोई अनहोनी नहीं होगी, यह मैं कैसे मान सकता हूँ। इसके विपरीत मैं तो यह मानता हूँ कि जिस दिन स्वराज्य मिलनेवाला होगा उस दिन वह अकल्पित रूपमें ही मिलेगा। इस कारण उसे निकट लाने के लिए हमें जो कुछ करना चाहिए वह हम कर गुजरें, यही हमारा धर्म है। फिर भी बाबू हरदयाल नागका पत्र अवश्य ही स्वागतके योग्य है। इस पत्रमें उनका उत्साह छलका पड़ता है। वह युवकोंके मनन करनेकी चीज है। जिस तरह बंगालके यह बूढ़े नेता तैयारी कर रहे हैं, नौजवान भी वैसी ही तैयारी करें। और अगर वे तैयारी करना चाहते हैं तो कांग्रेसके रचनात्मक प्रस्तावको ध्यानमें रखें। उसकी शर्तोंका वे पालन करें। क्योंकि यह प्रस्ताव जनताको अगले सालके लिए तैयार करनेके लिए काफी है। सरदार या नेताका सवाल मौका आनेपर अपने आप ही सुलझ जायेगा। हमें मतलब सरदारसे नहीं, बल्कि सरदारके जरिये मिलनेवाली
- ↑ इसके बादका अनुच्छेद २४-२-१९२९ के गुजराती नवजीवनसे लिया गया है।