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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 40.pdf/८८

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

है। इसलिए हर व्यक्तिको खानपान और वस्त्रोंमें सादगी और मितव्ययितासे काम लेना चाहिए और स्वदेशीको प्रोत्साहन देना चाहिए।

[गुजरातीसे]
प्रजाबन्धु, ३-३-१९२९
 

५७. भाषण : अहमदाबादकी सार्वजनिक सभा में[]

२८ फरवरी, १९२९

शास्त्रीजी और मेरे सम्बन्ध ऐसे हैं कि मुझे उनके बारेमें अपने मुँहसे कुछ कहने की जरूरत नहीं है। उनके और मेरे राजनैतिक विचारोंमें चाहे उत्तर-दक्षिण-सा अन्तर हो, फिर भी उनके और मेरे हृदयका जो मेल है वैसा दृढ़ मिलन अन्य दो व्यक्तियोंमें हो ही नहीं सकता। बहुत-सी बातोंमें मतभेद होनेपर भी यह मित्रता निभ रही है, इसमें किसकी उदारताका हाथ ज्यादा है, यह मैं नहीं जानता। मेरे विषयमें तो उन्होंने यह भी कहा है कि मैं किसी भी दूसरे व्यक्तिकी बात सहन नहीं कर सकता। फिर भी हममें मित्रता या विरोधका सम्बन्ध मधुर ही रहा है। शास्त्रीजीने दक्षिण आफ्रिकामें भारतकी जो सेवा की है उसका मूल्यांकन इस समय करना ठीक नहीं होगा। पर्वतकी तलहटीमें खड़ा मनुष्य उसकी शोभा नहीं देख पाता। किन्तु जैसे ही वह पर्वतके दूर जाकर देखता है वैसे ही उसे उसकी शोभा दिखाई देने लगती है। उसी प्रकार शास्त्रीजीके बीस महीनेके इस कार्यकालसे आप जैसे-जैसे दूर जाते जायेंगे वैसे ही उनके कार्यका मूल्यांकन करनेके योग्य बनेंगे। दक्षिण आफ्रिका जाकर उन्होंने दोनों हाथोंसे अपना पैसा लुटाया। दक्षिण आफ्रिकामें मैं अपने देशकी प्रतिष्ठा कैसे बढ़ा सकता हूँ, यही विचार उनके मनमें था। दक्षिण आफ्रिकामें उनके कुछ आलोचक भी थे। और मुझे दोनों प्रकारके वर्णन मिले हैं। जिनकी कोई आलोचना करनेवाला नहीं होता, उनका कार्य बिलकुल ठीक है, इस विषयमें मनमें शंका रहती है। शास्त्रीजीने दक्षिण आफ्रिकामें रहकर सभी उपनिवेशवासी भारतीयोंकी सेवा की है। उनपर शास्त्रीजीने अपनी दक्षता और शुद्धताकी छाप डाली है। प्रजाके दूतकी तरह वहाँ रहकर वे स्वराज्यको भी दो कदम पास ले आये हैं। अब हमें उनके अनुभवसे कुछ सीखना है और मेरी तो यही इच्छा है कि वे दीर्घायु होकर भारत की सेवा करें।

[गुजरातीसे]
प्रजाबन्धु, ३-३-१९२९
  1. यह सभा श्रीनिवास शास्त्रीके दक्षिण आफ्रिकाके अनुभव सुननेके लिए आयोजित की गई थी। सभाकी अध्यक्षता गांधीजीने की थी।