५८. भाषण : ध्वजारोहण समारोहपर, अहमदाबाद में
२८ फरवरी, १९२९
मैंने तो यह सोचा था कि यहाँ आकर मुझे कुछ सभासदोंके समक्ष झण्डा ही फहराना होगा। किन्तु जैसा प्रमुखने कहा है यहाँ भी मुझे कुछ शब्द कहने ही होंगे। आपने मुझे राष्ट्रीय झण्डा फहरानेका अवसर दिया, इसके लिए मैं आपका आभारी मैं नगरपालिकाको दुबारा धन्यवाद देता हूँ कि उसने राष्ट्रीय झण्डा अपनाया। इस झण्डेका जो अर्थ है, मुझे लगता है कि सब लोग उसे नहीं समझते। मैंने तो अपनी एक कल्पना व्यक्त की[१] और उसे भारतके अधिकांश लोगोंने अपना लिया। यद्यपि उसके विषयमें काफी मतभेद है तो भी जहाँतक मैं देख पाया हूँ वहाँतक भारतके अधिकांश लोग उससे सहमत हैं।
इस झण्डे में तीन रंग हैं-लाल, हरा और सफेद। लाल हिन्दुओंके लिए, हरा मुसलमानोंके लिए तथा सफेद दूसरी जातियोंके लिए है। इसमें एक बहुत बड़ी भावना निहित है। वह तो मानो त्रिवेणीका संगम है और सभीके मिलकर चलनेकी कामना करता है। इसके बीच जो चरखेका चिन्ह है वह इस बातका सूचक है कि हम सबको उसका आश्रय लेना है। निश्चय ही इस झण्डेमें ये बाह्य चिह्न हैं किन्तु यदि चरखे और सब अलग-अलग रंगोंके होते हुए भी उसमें निहित भावना हममें न हो तो जैसा मैंने बगीचेमें[२] कहा था, वह कपड़ेका एक चिथड़ा-मात्र है।
आज भारतमें कई लोग कहते हैं कि हिन्दू और मुसलमानोंमें मेल नहीं हो सकता। वे कहते हैं मियाँ और महादेवकी न कभी बनी है, न बन ही सकती है। यहाँपर स्वराज्य या तो हिन्दुओंको मिल सकता है या मुसलमानोंको। इन दोनों कौमोंके अतिरिक्त दूसरे लोग सोचते हैं कि हमारा काम जापान या जर्मनीके राज्यके बिना नहीं चल सकता। यदि अब भी यही विचार हो तो इस झण्डेको फहराने का कोई अर्थ नहीं है। इस झण्डेको फहरानेके समय जो लोग साक्षी हैं उन्हें यही प्रतिज्ञा करनी चाहिए कि वे हिन्दू हों, मुसलमान हों, ईसाई हों, चाहे जिस किसी और कौमके हों यदि वे भारतको अपना देश मानते हों तो उन्हें एक-दूसरेके साथ मिलकर भारतके लिए स्वराज्य प्राप्त करना है। अध्यक्षने[३] सच ही कहा है कि हम सब स्वतन्त्रता प्राप्त करना चाहते हैं।
हम जिस स्वराज्यकी कामना करते हैं, वह इन तीन रंगोंकी शक्तिसे ही प्राप्त होगा। और यदि हम यह मानते हों कि स्वराज्य हमें दूसरे किसी भी तरीके से