वर्षोंसे भारत में ईसाई-धर्म घनिष्ठ रूपसे ब्रिटिश शासनके साथ जुड़ा रहा है। यह धर्म हमें भौतिकवादी सभ्यताका तथा बलवान गोरी जातियों द्वारा संसारकी निर्बल जातियों के साम्राज्यवादी शोषणका पर्याय प्रतीत होता है। इसीलिए ईसाई-धर्मका भारतके प्रति योगदान ज्यादातर नकारात्मक ही है। जो लोग अपनेको ईसाई-धर्मका अनुयायी बताते हैं, उनके बावजूद इसने कुछ भलाई की है। इसने हमें चौंका कर सचेत किया है और अब हम अपने घरको दुरुस्त करनेकी तरफ ध्यान देने लगे हैं। ईसाई मिशनरी साहित्यने हमारी कुछ बुराइयोंको तीव्रताके साथ हमारे सामने रखा है और हमें सोचनेपर मजबूर किया है।
जो चीज मुझे सबसे अधिक दिलचस्प लगी है वह है, अस्पृश्यता-निवारणसे सम्बन्धित आपका कार्य। क्या आप मेहरबानी करके मुझे यह बतायेंगे कि वह ऐसा कौन-सा आशाजनक चिह्न है जिससे यह प्रकट होता है कि यह प्रथा, जैसा कि आप कहते हैं, आखिरी साँस ले रही है?
रूढ़िवादी हिन्दू-धर्ममें जो प्रतिक्रिया हो रही है और वह प्रतिक्रिया जितनी तेजीसे हुई है उससे यह बात साफ प्रकट होती है। एक सुप्रसिद्ध उदाहरणके तौर पर मैं पण्डित मालवीयजीका उल्लेख करूँगा। दस साल पहले वह अस्पृश्यताके नियमोंका पालन बहुत आग्रहपूर्वक किया करते थे, जैसा कि उस समयके अधिकांश कट्टर हिन्दू किया करते थे। लेकिन आज वह गंगाके तटपर अस्पृश्योंमें शुद्धिका मन्त्र फूँककर गर्वका अनुभव कर रहे हैं और इसके चलते कभी-कभी तो नासमझ रूढ़िवादिताके कोपभाजन भी बनते हैं। इस कामकी वजहसे पिछली दिसम्बर में कलकत्तामें वह कट्टर-पंथी लोगों के हाथों लगभग मार खाते-खाते बचे थे। हालमें वर्धा में एक धनी व्यापारी सेठ जमनालाल बजाजने अपने सुन्दर मन्दिरको अस्पृश्योंके लिए खोल दिया है और इसमें उन्हें किसी खास विरोधका सामना नहीं करना पड़ा। इसके बारेमें सबसे महत्त्वपूर्ण बात तो यह है कि मन्दिर में आनेवालोंका रिकार्ड देखनेपर पता चला कि जबसे मन्दिरमें अस्पृश्योंका प्रवेश शुरू हुआ है तबसे संख्या में कमी होनेके बजाय वृद्धि ही हुई है। स्थितिका सार-संक्षेप यह है कि मैं आशा करता हूँ कि अस्पृश्यताके प्रति यह जो ज्वार उठ रहा है इसमें निकट भविष्य में ही और अधिक तेजी आये, हालाँकि यह पहले ही आश्चर्यजनक रूपसे तेज रही है।
आपको अपने मित्र कहाँसे मिलते हैं? क्या मुसलमान और ईसाई इस काम में आपको सहायता देते हैं?
यह ऐसा मामला है जिसमें मुसलमान और ईसाई कुछ भी सहायता नहीं दे सकते। अस्पृश्यता-निवारणका प्रश्न खास तौरपर हिन्दू-धर्मकी शुद्धिका प्रश्न है। यह अन्दरसे ही की जा सकती है।
लेकिन मेरा तो यह खयाल था कि इस काम में ईसाई आपकी ज्यादा मदद कर सकते हैं। चर्च ऑफ इंग्लैंड की मिशन के बिशप रेवरेंड व्हाइटहेडने मद्रास प्रेसीडेंसी में अस्पृश्योंकी दशा सुधारनेसे सम्बन्धित ईसाई जन-आन्दोलनके प्रभावके बारेमें कुछ महत्वपूर्ण बातें बताई हैं ।