संस्थाओं में जो श्रेष्ठ चीज है वह सारे विश्वके सामने है, और वह उसकी नकल कर सकता है। लेकिन महज राजनीतिक ज्ञानकी शिक्षा देनेके लिए अंग्रेजोंको शासकके रूप में भारत आनेकी कोई जरूरत नहीं है। जो कुछ भारतके ग्रहण करने योग्य है वह आत्मसात् करनेकी क्रियाके जरिये आना चाहिए, ऊपरसे थोपा नहीं जाना चाहिए। मिसाल के तौर पर चित्रकलाके काममें चीनी निपुण होते हैं, इसपर उनका पूरा अधिकार है, अतः सारी दुनियाको उसकी प्रशंसा और उसका अनुकरण करना चाहिए। चीनी लोग आयें और इंग्लैंडको ललित कलाओंकी शिक्षा देनेके लिए इंग्लैंडपर कब्जा कर लें, आप यह अपेक्षा तो नहीं करेंगी या करेंगी?
"नहीं!" अंग्रेज मित्रने अपनी गलत स्थितिको महसूस करते हुए कहा जिसमें उन्होंने अपनेको अनजाने डाल दिया था।
इसके बाद इंग्लैंड और भारतके बीच आपसी सम्बन्ध किस प्रकार ठीक किये जायें, इसके बारेमें बातचीत होने लगी।
इसके लिए एक ऐसा सिद्धान्त होना चाहिए जिसके अनुसार हर राष्ट्र उस नीतिसे बाज आये जो दूसरोंके हितोंके प्रतिकूल हो।
दूसरी भेंट एक अमेरिकी महिलाके साथ हुई। "क्या अस्पृश्योंकी दशा भी उतनी ही बुरी है जितनी अमेरिकामें नीग्रो लोगों की?" उसने पूछा।
दोनों में कोई सही तुलना नहीं की जा सकती। ये एक जैसी नहीं हैं। अपने देश में अस्पृश्य व्यक्ति दलित और उत्पीड़ित जैसा कुछ भी हो, लेकिन उसके साथ कोई कानूनी भेदभाव नहीं रखा जाता है, जैसा कि अमेरिकामें नीग्रो लोगोंके मामले में है। फिर भी यद्यपि कभी-कभी हमारे रूढ़िवादी लोग बहुत कठोर व्यवहार करते हैं जिससे और कुछ तो नहीं पर मानवतावादी लोगोंको तीव्र व्यथा हो सकती हैं, लेकिन फिर भी अस्पृश्योंके प्रति अंधविश्वासपूर्ण पूर्वग्रह वैसी हिंसक उग्रताका रूप ग्रहण नहीं कर सकता जैसा कि अमेरिकामें नोग्रो लोगोंके विरुद्ध कभी-कभी हो जाता है। अमेरिकामें नीग्रो लोगों को मारना-पीटना कोई असाधारण घटना नहीं है। लेकिन अहिंसाकी परम्पराकी वजहसे भारत में ये सब बातें असम्भव हैं। इतना ही नहीं, भारत में लोक-कल्याणकी प्रवृत्ति जातिगत भेदभाव के खिलाफ रही है जिसके फलस्वरूप अस्पृश्योंमें किसी-किसीको सन्त भी स्वीकार कर लिया गया है। हमारे यहाँ बहुतसे अस्पृश्य सन्त हैं। मुझे नहीं मालूम कि आपके यहाँ भी नीग्रो सन्त हैं या नहीं। अस्पृश्यताके प्रति द्वेष तेजीसे मिट रहा है। मैं चाहता हूँ कि कोई मुझे आकर यह आश्वासन दे कि अमेरिकामें रंगभेद खत्म हो गया है।
तीसरी भेंट दक्षिण आफ्रिकाके एक उच्च शिक्षा प्राप्त नीग्रोके साथ हुई ... उसे इस बातका बहुत दुःख था कि पढ़े-लिखे नीग्रो खुद अपनी जातिके प्रति उदासीन हैं। उसने दुखी मनसे यह शिकायत की, "वे बिल्कुल पराये-जैसे हो गये हैं। अपनी जातिको वे भूल गये हैं" ... "हमें रोंदा गया, कुचला गया, तथा उत्पीड़ित किया गया। हमें यह नहीं मालूम कि हम किस राह चलें। हममें से अधिकांश अज्ञानी