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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 40.pdf/९८

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मयं

हैं। अज्ञानतायें गरीबीका जन्म हुआ है। ये दोनों चीजें साथ-साथ रहती हैं और इनका एक दुष्चक्र-जैसा चलता है। इसके अलावा, यदि वह बाह्य शक्ति है जो प्रकृतिकी अंधशक्तिकी भाँति ही निर्मम और क्रूर है, और जिसके आगे क्षमा माँगने या याचना करनेसे कोई नतीजा नहीं निकलता। हम अपनेको दुखी और पराजित महसूस करते हैं। आशा और मुक्ति के सन्देशको खातिर हम स्वाभाविक रूपसे भारतकी ओर झुके हैं क्योंकि हमें विश्वास है कि विश्वकी सभी उत्पीडित जातियों के सम्बन्धमें भारतको अपना ध्येय पूरा करना है।" गांधीजी इससे बहुत प्रभावित हुए।

जब मैं दक्षिण आफ्रिकामें था तो मुझे वहाँके वतनियोंके साथ इस विषयपर बातचीत करनेका मौका मिला था। मैंने उन्हें बताया कि उन्हें अपनी सहायता स्वयं करनी है और उन्हें सदैव इस आशाके साथ काम करना है कि वक्त आनेपर उन्हें कहीं-न-कहीं से सहायता मिल जायेगी। इस बीच उन्हें आत्मशुद्धिकी प्रक्रिया द्वारा इस कामके लिए तैयार होना है।

मैं आपका मतलब समझता हूँ, लेकिन जो बात हम आपसे जानना चाहते हैं वह यह है कि इस आन्तरिक प्रक्रियाका सम्बन्ध हम उन वास्तविक दैनिक समस्याओंके साथ, जो इस समय हमारे सामने मौजूद हैं, कैसे स्थापित करें--इस आत्मशुद्धिकी प्रक्रियाको शुरुआत कैसे करें।

पहला काम तो यह है कि आप अपने अन्दर झाँकिये और अपने अवगुणोंको, स्वयं अपने तथा विश्वके सामने स्वीकार कीजिए। अपनी कमजोरियोंको छिपाने और अपनी झूठी शक्तिका बखान करने-जैसा भ्रष्ट और अपमानजनक अवगुण और कोई नहीं है। दूसरा काम सार्वजनिक जीवनको शुद्ध बनाने में निधड़क और निडर होकर जुट जाना है। दुर्भाग्यवश आज लोगों में यह धारणा पैदा हो गई है कि किसीके सार्वजनिक कार्योंपर उसके व्यक्तिगत आचरणका प्रभाव नहीं पड़ता। यह अन्धविश्वास अवश्य मिटना चाहिए। हमारे सार्वजनिक कार्यकर्त्ता पहले तो अपनेको सुधारें और फिर समाज-सुधारके काम में जुट जायें। आत्मशुद्धिका यह आध्यात्मिक शस्त्र हालांकि अमूर्त लगता है, लेकिन किसीको स्थितिका कायापलट करने और बाह्य बंधनोंसे मुक्त करानेका यह एक बहुत शक्तिशाली साधन है। यह सूक्ष्म और अप्रकट रूपमें काम करता है। यह एक गहन प्रक्रिया है; हालांकि यह अक्सर थका देनेवाली और धीमी प्रक्रिया लगती है। पर मुक्ति के लिए यह सबसे सीधा, सुनिश्चित और द्रुतगामी रास्ता है और इसके लिए जितना भी प्रयास किया जाये वह कम ही होगा। इसके लिए जरूरत विश्वासकी है--उस विश्वासकी जो पर्वतकी तरह अटल है, जो किसी चीज के सामने पीछे नहीं हटता।

गांधीजीने समझा कि उन्होंने काफी-कुछ कह डाला है और बातचीत अब समाप्त हो गई है, लेकिन आफ्रिकी मित्रने यह बताकर कि भारत द्वारा कताई-बुनाईके घरेलू धन्धोंके पुनरुत्थानमें वे कितनी रुचि लेते हैं, गांधीजीको भारी आश्चर्यमें डाल दिया। उन्होंने बताया कि इसे वह अपने लोगोंके बीच, जो बेरोजगारी और बेकारीके