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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 41.pdf/१०४

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

ऐसा ही दावा पेश करे। मुझे भय है कि हिन्दू कहे जानेवालोंके लिए भी गीताकी शिक्षा अनिवार्य नहीं बनाई जा सकती। कई सिख और जैन अपने-आपको हिन्दू मानते हैं, मगर सम्भव है, वे अपने बालक-बालिकाओंको अनिवार्य रूपसे गीताके पढ़ाये जानेका विरोध करें। साम्प्रदायिक या जातीय शालाओंकी बात ही दूसरी होगी । मसलन एक वैष्णव शालाके लिए गीताको धार्मिक शिक्षाका अंग बनाना मेरी राय में बिलकुल उचित होगा । प्रत्येक स्वतन्त्र शालाको हक है कि वह अपनी पढ़ाईका पाठ्य- क्रम स्वयं निश्चित करे । मगर एक राष्ट्रीय शालाको तो स्पष्ट मर्यादाओंमें रहकर काम करना पड़ता है। जहाँ अधिकार या हकमें दस्तन्दाजी नहीं होती, वहाँ अनि- वार्यताका भी प्रश्न नहीं उठता। एक खानगी पाठशालामें प्रवेश करनेका कोई दावा नहीं कर सकता, मगर यह मानी हुई बात है कि राष्ट्रके प्रत्येक सदस्यको राष्ट्रीय शाला में जानेका अधिकार है । अतएव एक जगह जो बात प्रवेशकी शर्त मानी जायेगी, वही दूसरी जगह अनिवार्य नहीं होगी। बाहरी दबाव से गीता कभी विश्वव्यापिनी नहीं होगी । वह विश्वव्यापिनी तो तभी होगी, जब उसके प्रशंसक उसे जबर्दस्ती दूसरोंके गले न उतारकर स्वयं अपने जीवन द्वारा उसकी शिक्षाओंको मूर्तरूप देंगे ।

एक प्रतिवाद

पाठकोंको याद होगा कि आन्ध्रके एक पत्र लेखकने शिकायत की थी कि तनुकूकी उस सभा में शरीक बहनोंने, जिसमें मेरे साथ एक अन्त्यज कन्या लक्ष्मी उपस्थित थी, पवित्र होनेके विचारसे अपने-अपने घर पहुँचनेपर नहाया -धोया था और तब मैंने इस शिकायतपर कुछ पंक्तियाँ लिखी थीं।[] अब दो सज्जनोंने पत्र लिखकर इस बातका प्रतिवाद किया है और कहा है कि यह बात बिलकुल ही गलत है । मैं उन दो पत्रोंमें से एक यहाँ दे रहा हूँ ।[]

'यंग इंडिया' के १६ तारीख के अंकमें आपकी तनुकूकी महिलाओं सम्बन्धी अस्पृश्यता' शीर्षक टिप्पणी पढ़कर हम सबको हैरत हुई है । पत्र-लेखकने जो कहा है अगर वह सच होता तो आपका कथन ठीक कहलाता । किन्तु कहतेbहुए दुःख होता है कि आपके संवाददाताने जबर्दस्त भूल की है ...।
मैं खुद सभा-स्थलमें उपस्थित था क्योंकि वहाँ मेरे परिवारकी स्त्रियाँ भी गई हुई थीं। मैं ब्राह्मण हूँ और मेरे परिवारको स्त्रियोंने लौटकर पवित्र होनेकी दृष्टिसे स्नान नहीं किया । सभामें उपस्थित अन्य अनेक महिलाओंको भी मैं जानता हूँ । उनसे बात करनेपर उन्होंने बताया कि ऐसी कोई बात उन्होंने सोची ही नहीं थी। शामका भोजन बनानेके पहले कुछ बहनोंने नहाया हो यह तो सम्भव है किन्तु यह कहना कि एक अन्त्यज लड़कीका स्पर्श हो जानेके कारण अपनेको पवित्र करनेकी दृष्टिसे उन्होंने स्नान किया, एक बड़ा लांछन लगाना है ।
  1. १. देखिए खण्ड ४० पृष्ठ ३९५ ९७ ।
  2. २. अंशतः उद्धृत ।