सात
किया जाये। (पृष्ठ २७८-७९) अध्यक्षपदके लिए उन्होंने जवाहरलालका नाम सुझाया और कहा, वह सभापति हुए तो क्या और मैं हुआ तो क्या; विचार या बुद्धिके लिहाज से हममें मतभेद भले ही हों, हमारे दिल तो एक हैं। दूसरे, यौवन-सुलभ उग्रताके होते हुए भी, अपने कड़े अनुशासन और एकनिष्ठता आदि गुणोंके कारण वह ऐसे अद्वितीय सहयोगी हैं कि उनमें पूरा-पूरा विश्वास किया जा सकता है।" (पृष्ठ २७९)
अपने आहार सम्बन्धी प्रयोगोंके विषय में उन्होंने कहा कि मैं जानता हूँ कि लोग मुझे, सनकी, झक्की, दीवाना आदि कहते हैं (पृ॰ ३३)। तथापि उन्होंने स्पष्ट किया कि ये प्रयोग उनके जीवनके अंश बन गये हैं और उनकी अपनी मानसिक शान्तिके लिए भी वे आवश्यक हैं। घनश्यामदास बिड़लाको लिखे पत्र में उन्होंने लिखा कि लम्बी अवधि तक प्रयोग और जाँच-पड़ताल करके मैंने देखा है कि भोजनके बारेमें ऐसा कोई एक भी नियम नहीं है जो सभी व्यक्तियों पर समान रूपसे लागू हो सके। तथापि मैं एक सत्य शोधक होने के नाते किसी ऐसी खुराककी खोज करते रहना जरूरी मानता हूँ जो आदमी के शरीर, मन और आत्माको स्वस्थ बनाये रख सके। (पृष्ठ ३४७) इस विषय में पत्र लिखनेवाले सज्जनों और 'नवजीवन' के पाठकोंको वे अपने प्रयोगोंके परिणामोंसे सदा अवगत करते रहे और अपने अनुभव के आधार पर उन्हें सलाह-मशविरा भी देते रहे। (पृष्ठ ३०२-५) बिना पकाए भोजनके विषयमें उन्होंने उन्हीं दिनों जो प्रयोग किये थे, वे सफल सिद्ध नहीं हुए थे; इसलिए उन्होंने उन्हें अगस्त के मध्य में छोड़ तो दिया किन्तु फिर कभी अधिक सावधानीसे करके उनमें सफलता पाने की आशा नहीं छोड़ी। (पृष्ठ ३३-५, ५९, २३२-६, २४७-९, २५१, ३०३-५ और ३४७)
अल्मोड़ा में विश्राम करते हुए गांधीजीने हिमालयकी श्रेणियोंके सौन्दर्यको जी-भरकर पिया और एकाध बार पत्रों आदिमें उनका कवित्वमय वर्णन भी किया। उन्होंने हिमालयको एक जगह 'ऋषिराज' कहा है (पृष्ठ ७३) और लिखा है कि ये हरी-भरी सुन्दर श्रेणियाँ ऐसी जान पड़ती हैं मानो उन्होंने हरित शस्यके परिधान पहन रखे हों। (पृष्ठ ८०) किन्तु सौन्दर्यके इस वैभवका आनन्द लेते हुए उनके मनमें काँटा-सा खटकता रहता था; वह एक क्षणके लिए भी देशके दुःखको नहीं भुला पाते थे और उन्हें लगता था कि इस सारे सौन्दर्यका उपभोग करनेका औचित्य ढूंढ़ निकालना कठिन है। (पृ॰ ८०, १८२) कई बार गांधीजीको ऐसा लगता था मानो उन्हें वहाँ बैठे हुए शंकराचार्यका स्वर सुनाई पड़ रहा है और वे कह रहे हैं कि सचमुच यह अद्भुत दर्शन है, मगर सारी ईश्वरीय माया है। न हिमालय, न मैं हूँ, न तू है; जो-कुछ है सो वह है और वह भी ब्रह्म ही है। वही सत्य है, जगत