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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 41.pdf/११६

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

अगर अबतक तुम्हारा प्रयत्न सफल नहीं हुआ है तो इससे क्या होता है ? तुमने अभीतक लक्षणोंका यन्त्रवत् उपचार किया है और उसमें तुम्हें उल्लेखनीय सफलता मिली है। यदि मैं यह कहता हूँ कि तुम अभीतक जड़तक नहीं पहुँच सकी हो तो इसमें रोनेकी क्या बात है । मुझे तुम्हारी असफलता होते रहनेसे चिन्ता नहीं होती । असफलताएँ तो सफलताको सोढ़ियाँ हैं । पुनः न गिरनेके निश्चयके साथ तुम्हें ऊपर उठना है ।

मेरी बात पूरी हुई। ईश्वर तुम्हारी रक्षा करे ।

सस्नेह,

बापू

अंग्रेजी (सी० डब्ल्यू० ५३७८ ) से तथा ( जी० एन० ९४३४ ) से भी ।
सौजन्य : मीराबहन

७४. पत्र : छगनलाल जोशीको

मौनवार, [ २४ जून, १९२९][]

चि० छगनलाल,

तुम्हारे पत्र मिल गये हैं ।

मेरे सामने हिमालयके शिखर बर्फ में स्नान कर रहे हैं और सूर्यके प्रकाशमें जगमगा रहे हैं । नीचे छोटे पहाड़ोंकी हरी-भरी सुन्दर श्रेणियाँ हैं; मानो उन्होंने लाज में अपने आपको हरियालीसे ढँक लिया हो । यहाँका एकान्त अनुपम है । यहाँ सात-आठ दिन रहना है । इतना वैभव किसी कामके बीच में ही सहन किया जा सकता है। काम काकाने भेज दिया है और यह प्रबन्ध भी उसीका सुझाया हुआ है। उसने देवदास और प्रभुदासपर यह निर्णय लेनेका जोर दिया था और मैंने जितना बने उतना समय ' गीता 'में लगाने का निश्चय करके इस वैभवको स्वीकार किया है । इसलिए इस सप्ताह कम से कम पत्र लिखूंगा और 'यंग इंडिया' के लिए भी जितना कम काम कर सकूं उतना ही करूँगा । इसलिए सभी सामान्य पत्र तो बन्द ही रखूंगा ।

तुम अवकाश लेना चाहते हो। वह मैं वहाँ आते ही दे दूंगा । तुम तैयार रहना । जो कुछ मुझे पूछना हो उसके बारेमें लिखकर रखना । तुम्हारी गैरहाजिरी में कौन तुम्हारा काम सँभालेगा यह देख लेना । रमणीकलाल सँभाले तो अच्छा है। आराम कहाँ जाकर करना है, इसका भी विचार कर लेना ।

कट्टो वगैरा जैसा करते हैं वैसा तो बहुत-से लड़के करते हैं । अपने दोषोंके लिए

गिरिराज तो जवाबदेह है ही। उसका पत्र इस मामलेपर नया प्रकाश डालता है ।

 
  1. १. लगता है कि यह पत्र कौसानी पहुँचनेके बाद आनेवाले मौनवारको लिखा गया होगा।