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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 41.pdf/११९

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७८. तार : क्लोएट्जको[]

[ २६ जून, १९२९ अथवा उसके पश्चात् ]

छ: को आश्रम पहुँच रहा हूँ तबतक कहीं भी मिलना कठिन ।

गांधी

अंग्रेजी (एस० एन० १५४०८) की माइक्रोफिल्मसे ।

७९. अनूठा मानपत्र

आन्ध्रके दौरेके दिनों लिये गये नोट अब तक अनदेखे पड़े हैं, परन्तु उनमें से मुझे नल्लागाका की एस० एल० एन० फैक्टरीके मजदूरों द्वारा दिये गये एक अनूठे किन्तु शिक्षाप्रद मानपत्रके निम्नलिखित उद्धरणोंपर मेरी नजर पड़ी है :

हमने पहली बार १९१६ में भापकी शक्ति से चलनेवाली विदेशी मशीनों द्वारा अपनी रुईकी ओटाई होते देखी थी । तबतक इन इलाकोंमें ओटाईका काम हायकी मशीनोंसे किया जाता था । उन दिनों गर्मीके तीन महीने हमारे पास पर्याप्त काम रहता था, जिससे हम अपनी और अपने बच्चोंकी गुजर-बसर कर लेते थे। हमारी यह फैक्टरी अब बोस गाँवोंमें पैदा होनेवाली रुईकी ओटाई कर सकती है; और अब हम लोगोंमें से इने-गिने लोगोंको ही काम मिल पाता है ।
सन् १९२० के आसपास जब आप मुसीबत में पड़े हारे-थके उत्तरी भारतमें हाथ-बुनाईके पुनरुद्धारका काम शुरू कर रहे थे, तब इस भागमें बसनेवाले किसानों और मजदूरोंमें चन्द ही ऐसे थे जो अपने दैनिक उपयोगके लिए कपड़ा खरीदने में समर्थ थे । आठ वर्ष बीत चुके हैं। मिलोंका बना सूत बाजारमें आ गया है । उसके इस सस्तेपन और एकसार सूतने हमें आकर्षित किया है। अपने-आपमें केवल बुननेका कोई महत्व नहीं रहा। अब हम लगभग स्थानीय बुनकरों द्वारा, मुख्यतः मिलके सूतसे बुने हुए, कपड़ोंको खरीदने की स्थितिमें आ गये हैं । ये बुनकर अधिकांशतः दलित वर्गीके होते हैं। हम अब भी यह मानते हैं कि मिलका बना कपड़ा और विदेशी कपड़ा पहनना एक ऐसी फिजूलखर्ची है जिसे

ब्राह्मण और वैश्य समाज बर्दाश्त कर सकते हैं। दैनिक प्रयोगके लिए विदेशी

  1. १. अहमदाबादसे २४ जूनको भेजे गये उनके तारके उत्तरमें जो अलमोदामें २६ जूनको प्राप्त हुआ था। तार इस प्रकार था : “ कृपया आश्रमके पतेपर तार। इस सप्ताह कब और कहाँ मिल सकता हूँ ।"