स्थिरताकी बात अलग है। योगीकी स्थिरतामें तीव्रतम गति है । उस स्थिरता में आत्माकी तीव्रतम जागृति हैं । हम यहाँ जिस स्थिरताकी बात कर रहे हैं उसे दूसरे शब्दोंमें जड़ता कहा जा सकता है। जड़ताके वशीभूत होकर हम सभी प्राचीन कुप्रथाओंका समर्थन करनेको तत्पर हो जाते हैं। हमारी यह जड़ता हमारी उन्नतिको रोकती है। यही जड़ता स्वराज्यकी दिशामें हमारी प्रगतिमें रुकावट डालती है ।
- अब पर्देसे होनेवाली हानियोंको देखें :
- १. स्त्रियोंकी शिक्षामें पर्दा बाधा डालता है ।
- २. स्त्रियोंकी मीरुताको बढ़ाता है ।
- ३. स्त्रियोंके स्वास्थ्यको बिगाड़ता है ।
- ४. स्त्रियों और पुरुषोंके बीच हो सकनेवाले स्वच्छ सम्बन्धोंमें बाधक बनता है ।
- ५. स्त्रियोंमें नीच वृत्तिका पोषण करता है ।
- ६. पर्दा स्त्रियोंको बाह्य जगतसे दूर रखता है इसलिए उन्हें उसका योग्य
अनुभव नहीं हो पाता ।
- ७. पर्दा अधगना-धर्म, सहचारी-धर्ममें बाधा डालता है ।
- ८. पर्दानशीन स्त्रियां स्वराज्यमें हरगिज अपना पूरा हिस्सा नहीं दे सकतीं ।
- ९. पर्देसे बाल - शिक्षा में रुकावट होती है ।
इन सब हानियोंको देखते हुए सभी विचारशील हिन्दुओंका धर्म है कि वे पर्देको तोड़ दें ।
क्या पर्दा तोड़नेका और क्या दूसरे सुधारोंका सबसे सरल इलाज उनको अपनेसे आरम्भ करना है। हमारे कार्यका अच्छा परिणाम देखकर दूसरे अपने-आप उसका अनुकरण करेंगे। एक बातका खयाल अत्यावश्यक है। सुधारक कमी विनयका और मर्यादाका त्याग नहीं करेगा। यदि पर्दा तोड़नेमें हेतु संयम है तो उसका तोड़ना कर्त्तव्य है और तभी वह टूट सकता है । पर्दा तोड़नेमें स्वच्छंदता भी हेतु हो सकती है । ऐसी अवस्थामें पर्दा टूट नहीं सकता, क्योंकि तब उससे जनतामें क्रोध पैदा होगा और क्रोधके वश होकर जनता बुद्धिका त्याग करके कुप्रथाका मी समर्थन करने लगेगी । जनताका हृदय पवित्र है । इस कारण अपवित्र हेतुका जनता कभी आदर नहीं करेगी ।
हिन्दी नवजीवन, २७-६-१९२९